भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 489, कुल 978 में से

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पृष्ठ 489

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४८५

उस इस [द्युलोकरूप] अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥

| तस्मिन्नेतस्मिन्यथोक्तलक्षणेऽग्नौ देवा यजमानप्राणा अग्न्यादिरूपा अधिदैवतम् । श्रद्धामग्निहोत्राहुतिपरिणामावस्थारूपाः सूक्ष्मा आपः श्रद्धाभाविताः श्रद्धा उच्यन्ते । पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीत्यपां होम्यतया प्रश्ने श्रुतत्वात् । श्रद्धा वा आपः, श्रद्धामेवारभ्य प्रणीय प्रचरन्ति, इति च विज्ञायते । तां श्रद्धामद्रूपां जुह्वति ।<br><br>तस्या आहुतेः सोमो राजापां श्रद्धाशब्दवाच्यानां द्युलोकाग्नौ हुतानां परिणामः सोमो राजा संभवति । यथर्ग्वेदादिपुष्परसा ऋगादिमधुकराेपनीतास्त आदित्ये यशआदिकार्यं रोहितादि- | उस इस उपर्युक्त लक्षणवाले अग्निमें देवगण—[अध्यात्मदृष्टिसे] यजमानके प्राण तथा अधिदैवत-रूपसे अग्नि आदि देवगण श्रद्धाका [ हवन करते हैं ] । अग्निहोत्रकी आहुतियोंकी परिणामावस्थारूप सूक्ष्म जल श्रद्धारूपसे भावित होनेके कारण श्रद्धा कहा जाता है। [ यहाँ 'श्रद्धा' शब्दसे जलका उल्लेख इसलिये किया गया है ] क्योंकि 'पाँचवीं' आहुति देनेपर जल 'पुरुष' शब्दवाची हो जाता है' इस प्रश्नमें जल होम्यद्रव्यरूपसे सुना गया था । इसके सिवा यह प्रसिद्ध भी है कि 'श्रद्धा ही जल है तथा श्रद्धासे आरम्भ करके ही लोग सामग्री जुटाकर कर्म करते हैं' । उस जलरूपा श्रद्धाका वे हवन करते हैं ।<br><br>उस आहुतिसे राजा सोम होता है अर्थात् 'श्रद्धा' शब्दवाच्य जल-का द्युलोकरूप अग्निमें हवन किये जानेपर उसका परिणामरूप दीप्ति-मान् चन्द्रमा होता है । जिस प्रकार ( अ० ३ खं० १ में ) यह कहा गया है कि 'ऋग्वेदादि पुष्पके रस ऋगादि मधुकरोंद्वारा ले जाये जानेपर आदित्यमें जिस प्रकार रोहितादिरूप |

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