छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 513, कुल 978 में से
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खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थं ५०९ ЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖЖ
| नमन्यच्चतुर्थगतिव्याख्यानेन । एष देवयानः पन्था व्याख्यातः सत्यलोकावसानः, नाण्डाद्बहिः, “यदन्तरा पितरं मातरं च” (बृ० उ० ६।२।२) इति मन्त्रवर्णात् ॥ १-२ ॥ | में ) बतलायी हुई ] गतिकी व्याख्याके समान है । यह सत्यलोकमें समाप्त होनेवाले देवयानमार्गकी व्याख्या की गयी; इस मार्गकी ब्रह्माण्डसे बाहर गति नहीं है; जैसा कि जो “पिता ( द्युलोक ) और माता ( पृथिवी ) के बीचमें है” इस मन्त्रसे सिद्ध होता है ॥ १-२ ॥ |
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तृतीय प्रश्नका उत्तर
( देवयान और धूमयानका व्यावर्तनस्थान )
अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसंभवन्ति धूमाद्रात्रिश्रात्रेपरपक्षमपरपक्षाद्यान्षड् दक्षिणैति मासाँस्तान्नैते संवत्सरमभिप्रामुवन्ति ॥३॥
तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममें इष्ट, पूर्त और दत्त—ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं; धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छः महीनोंमें सूर्य दक्षिणमार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते हैं । ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते ॥ ३ ॥
| अथेत्यर्थान्तरप्रस्तावनाथः, य इमे गृहस्था ग्रामे, ग्राम इति गृहस्थानामसाधारणं विशेषणमरण्यवासिभ्यो व्यावृत्त्यर्थम् , यथा; वानप्रस्थपरिव्राजकानामरण्यं विशेषणं गृहस्थेभ्यो व्या- | ‘अथ’ यह शब्द दूसरे विषयकी प्रस्तावनाके लिये है, जो ये गृहस्थगण ग्राममें—जिस प्रकार ‘अरण्यम्’ यह वानप्रस्थ और परिव्राजकोंका गृहस्थोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये असाधारण विशेषण था, उसी प्रकार ‘ग्रामे’ यह वनवासियोंसे व्यावृत्ति करनेके लिये गृहस्थोंका |