छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 656, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें६५२ छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ६
| तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादन्नं मूलमित्यभिप्रायः। कथम्? अशितं ह्यन्नमद्भिर्द्रवीकृतं जाठरेणाग्निना पच्यमानं रसभावेन परिणमते। रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा मज्जायाः शुक्रम्। तथा योषिद्भुक्तं चान्नं रसादिक्रमेणैव परिणतं लोहितं भवति। ताभ्यां शुक्रशोणिताभ्यामन्नकार्याभ्यां संयुक्ताभ्यामन्नेनैवं प्रत्यहं भुज्यमानेनापूर्यमाणाभ्यां कुड्यमिव मृत्पिण्डैः प्रत्यहमुपचीयमानोऽन्नमूलो देहशुङ्गः परिनिष्पन्न इत्यर्थः। | अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है? तात्पर्य यह है कि अन्न ही इसका मूल है किस प्रकार? क्योंकि खाया हुआ अन्न ही जलके द्वारा द्रवीभूत होकर जठराग्निद्वारा पचाया जानेपर रसरूपमें परिणत हो जाता है। वह रससे रक्त, रक्तसे मांस, मांससे मेद, मेदसे अस्थि, अस्थिसे मज्जा और मज्जासे वीर्यरूपमें परिणत होता है। इसी प्रकार स्त्रीद्वारा खाया हुआ अन्न रसादिके क्रमसे परिणत होकर रज बनता है। उस परस्पर मिले हुए अन्नके कार्य तथा प्रतिदिन खाये जानेवाले अन्नसे पुष्ट हुए वीर्य और रजसे मृत्तिकाके पिण्डसे भीतके समान प्रतिदिन पुष्ट होनेवाला यह अन्नमूलक देहरूप अङ्कुर निष्पन्न हुआ है—ऐसा इसका तात्पर्य है? | | यत्तु देहशुङ्गस्य मूलमन्नं निर्दिष्टं तदपि देहवद्विनाशोत्पत्तिमत्वात्कस्माच्चिन्मूलादुत्पत्तितं शुङ्ग एवेति कृत्वाह—यथा | इस प्रकार जो देहरूप अङ्कुरका मूल अन्न बतलाया गया है वह भी देहके समान उत्पत्ति-नाशवाला होनेके कारण किसी मूलसे उत्पन्न हुआ अङ्कुर ही है—ऐसा मानकर आरुणि कहता है—'हे सोम्य! |