छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 692, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८८ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ६ |
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| मज्जाशुक्रकृमिमूत्रपुरीषवच्छीतो- | और मल-मूत्रसे पूर्ण तथा शीतोष्णादि | | ष्णाद्यनेकद्वन्द्वसुखदुःखवच्चेदंमो- | अनेकों द्वन्द्व और सुख-दुःखसे युक्त | | हपटाभिनद्धाक्षो भार्यापुत्रमित्र- | है, यह जीव मोहरूप वस्त्रसे बँधे हुए | | पशुबन्ध्वादिदृष्टानेकविषयतृष्णा- | नेत्रवाला होकर तथा स्त्री, पुत्र, मित्र, | | पाशितः पुण्यापुण्यादितस्करैः | पशु और बन्धु आदि दृष्ट तथा अदृष्ट | | प्रवेशितः 'अहममुष्य पुत्रो ममैते | अनेकों विषयतृष्णाओंसे जकड़ा जाकर | | बान्धवाः सुख्यहं दुःखी मूढः | पुण्य-पापरूप चोरोंद्वारा प्रवेशित | | पण्डितो धार्मिको बन्धुमाञ्जातो | कर दिये जानेपर 'मैं इसका पुत्र हूँ, | | मृतो जीर्णः पापी पुत्रो मे मृतो | ये मेरे बान्धव हैं, मैं सुखी, दुखी, | | धनं मे नष्टं हा हतोऽस्मि कथं | मूढ़, पण्डित, धार्मिक अथवा बन्धु- | | जीविष्यामि का मे गतिः किं मे | मान् हूँ, मैं उत्पन्न हुआ हूँ, मरता | | त्राणम् ?' इत्येवमनेकशतसहस्रा- | हूँ, जरामस्त हूँ, पापी हूँ, मेरा पुत्र | | नर्थजालवान्विक्रोशन्कथञ्चिद्देव | मर गया है, धन नष्ट हो गया है, | | पुण्यातिशयात्परमकारुणिकं क- | हा ! मैं मारा गया, अब कैसे जीवित | | ञ्चित्सद्ब्रह्मात्मविदं विमुक्तबन्धनं | रहूँगा ? मेरी क्या गति होगी ? | | ब्रह्मनिष्ठं यदासादयति । तेन च | अब मेरा रक्षक कौन है ?' इसी | | ब्रह्मविदा कारुण्याद्दर्शितसंसार- | प्रकारके अनेकों सैकड़ों अनर्थजालोंसे | | विषयदोषदर्शनमार्गो विरक्तः | युक्त होकर रोता हुआ जब पुण्यकी | | संसारविषयेभ्यः 'नासि त्वं | अधिकता होनेसे किसी प्रकार किसी | | संसार्यमुष्य पुत्रत्वादिधर्म- | परम कृपालु सद्ब्रह्मात्मज्ञ बन्ध- | | वान्' किं तर्हि ? 'सद् | नमुक्त ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषको प्राप्त | | यत्तत्त्वमसि' इत्यविद्यामोहप- | होता है और उस ब्रह्मवेत्ताद्वारा | | टामिनद्धनान्मोक्षितो गन्धारपुरुष- | दयावश सांसारिक विषयोंके दोष- | | | दर्शनका मार्ग दिखाये जानेपर | | | सांसारिक विषयोंसे विरक्त हो जाता | | | है तथा 'तू संसारी नहीं है और न | | | इसके पुत्रत्वादि धर्मवाला ही है;' | | | तो कौन है ?—'जो सत् तत्त्व है | | | वही तू है' इस प्रकारके उपदेशसे | | | अविद्यामय मोहरूप वस्त्रके बन्धनसे | | | छुड़ाया जाकर गान्धारदेशीय पुरुष |