छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 695, कुल 978 में से
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खण्ड १४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९१
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| वेदेत्यनुपपत्तिर्ज्ञानान्मोक्षाभावप्रसङ्गश्च। देशान्तरप्राप्त्युपायज्ञानवदनैकान्तिकफलत्वं वा ज्ञानस्य। | ज्ञानसे मोक्षप्राप्तिके अभावका प्रसङ्ग उपस्थित होगा। अथवा देशान्तरकी प्राप्तिके साधनोंके ज्ञानके समान ज्ञानका व्यभिचारिफलयुक्त होना सिद्ध होगा। ⁕ |
| (पूर्वोक्तदोष-परिहारः)<br>न; कर्मणां प्रवृत्ताप्रवृत्तफलत्वविशेषोपपत्तेः। यदुक्तमप्रवृत्तफलानां कर्मणां ध्रुवफलत्वाद्ब्रह्मविदः शरीरे पतिते शरीरान्तरमारब्धव्यमप्रवृत्तकर्मफलोपभोगार्थमिति, एतदसत्; विदुषः "तस्य तावदेव चिरम्" इति श्रुतेः प्रामाण्यात्। | सिद्धान्ती— ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि कर्मोंमें प्रवृत्तफलत्व और अप्रवृत्तफलत्व यह विशेषता होनी सम्भव है। अतः तुमने जो कहा कि अप्रवृत्तफल कर्म भी निश्चय फल देनेवाले हैं, इसलिये देहपात होनेके पश्चात् उन अप्रवृत्तफल कर्मोंका फल भोगनेके लिये देहान्तरका प्राप्त होना अवश्यम्भावी है—सो ठीक नहीं; क्योंकि "उस विद्वानके मोक्षमें तो उतना (देहपात होनेतकका) ही विलम्ब है"—यह श्रुति प्रमाण है। |
| ननु "पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति" (बृ० उ० ३।२।१३) इत्यादिश्रुतेरपि प्रामाण्यमेव। | पूर्व०— किंतु "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है" यह श्रुति भी तो प्रामाणिक ही है। |
| सत्यमेवम्, तथापि प्रवृत्तफलानामप्रवृत्तफलानां च कर्मणां | सिद्धान्ती— सचमुच ऐसा ही है। तो भी प्रवृत्तफल और अप्रवृत्त- |
⁕ अर्थात् जिस प्रकार देशान्तरकी प्राप्तिके साधन घोड़े आदि कोई विशेष विघ्न न होनेपर ही अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचते हैं उसी प्रकार जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं उन्हीं ज्ञानियोंका मोक्ष हो सकेगा—सबका नहीं।