भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 698

पञ्चदश खण्ड

मुमूर्षु पुरुषके दृष्टान्तद्वारा उपदेश

पुरुषᳪसोम्योतोपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति। तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥

हे सोम्य ! [ ज्वरादिसे ] संतप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं—'क्या तू मुझे जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ?' जबतक उसकी वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान लेता है ॥ १ ॥

| पुरुषं हे सोम्योतोपतापिनं ज्वराद्युपतापवन्तं ज्ञातयो बान्धवाः परिवार्योपासते मुमूर्षुम्— जानासि मां तव पितरं पुत्रं भ्रातरं वा—इति पृच्छन्तः। तस्य मुमूर्षोर्यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामित्येतदुक्तार्थम् ॥ १ ॥ | हे सोम्य ! उपतापी—ज्वरादिसे अत्यन्त संतप्त हुए पुरुषको ज्ञातिजन-बान्धवगण घेरकर उस मुमूर्षु पुरुषसे 'क्या तू मुझ अपने पिता, पुत्र अथवा भाईको पहचानता है ?' इस प्रकार पूछते हुए उसके चारों ओर बैठ जाते हैं । उस मुमूर्षु की जबतक वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता इत्यादि वाक्यका अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ १ ॥ |