छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 721, कुल 978 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१७
| भाष्य | भाष्यार्थ |
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| राजविशेषनिरूपणायां दृश्यमानेतरप्रत्याख्यातेऽन्यस्मिन्नदृश्यमानेऽपि राजनि राजप्रतीतिर्भवेत्तद्वत्। | कहलानेवाले विशेष व्यक्तिका निरूपण करनेपर अन्य दृश्यमान पुरुषोंका प्रत्याख्यान करके उनसे भिन्न राजाके साक्षात् दिखलायी न देनेपर भी राजाकी प्रतीति हो जाती है उसी प्रकार [अनात्माका बाध करके आत्माकी प्रतीति होती है]। |
| तस्मात्सोऽहं मन्त्रवित्कर्मविदेवास्मि कर्मकार्यं च सर्वं विकार इति विकारज्ञ एवास्मि नात्मविन्नात्मप्रकृतिस्वरूपज्ञ इत्यर्थः। अत एवोक्तम् "आचार्यवान्पुरुषो वेद" (छा० उ० ६। १४। २) इति। "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २। ४। १) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च। | अतः [नारदजी कहते हैं—] वह मैं मन्त्रवेत्ता अर्थात् कर्मवेत्ता ही हूँ, कर्मका कार्य ही सारा विकार है; अतः मैं विकारज्ञ ही हूँ—आत्मज्ञ अर्थात् आत्मारूप प्रकृति (कारण) के स्वरूपको जाननेवाला नहीं हूँ। इसीसे कहा है कि "आचार्यवान् पुरुष [आत्माको] जानता है" और यही बात "जहाँसे वाणी लौट आती है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी प्रमाणित होती है। |
| श्रुतमागमज्ञानमस्त्येव हि यस्मान्मे मम भगवद्दृशेभ्यो युष्मत्सदृशेभ्यस्तरत्यतिक्रामति शोकं मनस्तापमकृतार्थबुद्धितामात्मविदित्युतः सोऽहमनात्मविद्त्वाद्धे भगवः शोचाम्यकृतार्थ- | क्योंकि मैंने आप-जैसोंसे सुना है—मुझे ऐसा शास्त्रीय ज्ञान है कि 'आत्मवेत्ता शोक—मानसिक ताप अर्थात् अकृतार्थताबुद्धिको तर जाता है—पार कर लेता है' और हे भगवन्! मैं अनात्मज्ञ होनेके कारण शोक करता हूँ अर्थात् अकृतार्थ- |