छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 730, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७२६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानेनाथेच्छते प्राप्नोति ।<br>मनो ह्यात्मात्मनः कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सति मनसि नान्यथेति मनो ह्यात्मेत्युच्यते । मनो हि लोकः सत्येव हि मनसि लोको भवति तत्प्राप्त्युपायानुष्ठानं चेति मनो हि लोको यस्मात्तस्मान्मनो हि ब्रह्म । यत एवं तस्मान्मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | चाहूँ" ऐसे संकल्पपूर्वक उनकी प्राप्तिके उपायद्वारा उन्हें चाहता अर्थात् प्राप्त कर लेता है।<br>मन ही आत्मा है; क्योंकि मनके रहनेपर ही आत्माका कर्तृत्व-भोक्तृत्व सिद्ध होता है, अन्यथा नहीं; इसीसे 'मन ही आत्मा है' ऐसा कहा जाता है। मन ही लोक है; क्योंकि मनके रहनेपर ही लोक और उसकी प्राप्तिके उपायका अनुष्ठान होता है। इस प्रकार क्योंकि मन ही लोक है, इसलिये मन ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा है इसलिये मनकी उपासना करो ॥ १ ॥ |
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥
वह जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक मनकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि मनकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या मनसे भी बढ़कर कोई है?' [सनत्कुमार—] 'मनसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवन्! मेरे प्रति उसीका वर्णन करें' ॥ २ ॥
| स यो मन इत्यादि समानम् ॥ २ ॥ | 'स यो मनः' इत्यादि मन्त्रका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥