भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 732, कुल 978 में से

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पृष्ठ 732
७२८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| मन्त्राद्युच्चारणे । तां च वाचम् नाम्नि नामोच्चारणनिमित्तं विवक्षां कृत्वेरयति नाम्नि नामसामान्ये मन्त्राः शब्दविशेषाः सन्त एकं भवन्त्यन्तर्भवन्तीत्यर्थः । सामान्ये हि विशेषोऽन्तर्भवति ।<br><br>मन्त्रेषु कर्माण्येकं भवन्ति, मन्त्रप्रकाशितानि कर्माणि क्रियन्ते नामन्त्रकमस्ति कर्म । यद्धि मन्त्रप्रकाशनेन लब्धसत्ताकं सत्कर्म ब्राह्मणेनेदं कर्तव्यमस्मै फलायेति विधीयते। याप्युत्पत्तिर्ब्राह्मणेषु कर्मणां दृश्यते सापि मन्त्रेषु लब्धसत्ताकानामेव कर्मणां स्पष्टीकरणम् । न हि मन्त्राप्रकाशितं कर्म किञ्चिद्ब्राह्मणे उत्पन्नं दृश्यते । त्रयोविहितं कर्मेति | वाणीको प्रेरित करता है । और उस वाणीको नाममें अर्थात् नामोच्चारणनिमित्तक विवक्षा करके नाममें प्रेरित करता है तथा नामरूप सामान्यमें मन्त्र, जो शब्दविशेष ही हैं, एक होते हैं अर्थात् उसके अन्तर्भूत होते हैं; क्योंकि सामान्यमें विशेषका अन्तर्भाव होता है ।<br><br>मन्त्रोंमें कर्म एकरूप हो जाते हैं। मन्त्रोंसे प्रकाशित कर्म ही किये जाते हैं, मन्त्रहीन कोई भी कर्म नहीं है । [ यदि कहो कि कर्मोंका विधान तो ब्राह्मणभागमें भी है, फिर ऐसा कैसे माना जा सकता है कि कर्म मन्त्रप्रकाशित ही हैं तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ] जिस सत्कर्मको मन्त्रोंके प्रकाशित करनेसे सत्ता प्राप्त हुई है ब्राह्मणोंने उसीका ‘इसे अमुक फलके लिये करना चाहिये’ इस प्रकार विधान किया है । इसके सिवा ब्राह्मणोंमें जो कर्मोंकी उत्पत्ति देखी जाती है वह भी मन्त्रोंमें सत्ता प्राप्त किये हुए कर्मोंका ही स्पष्टीकरण है; मन्त्रोंसे अप्रकाशित कोई भी कर्म ब्राह्मणभागमें उत्पन्न हुआ नहीं देखा |

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