भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 736, कुल 978 में से

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पृष्ठ 736
७३२छान्दोग्योपनिषद्[अध्याय ७

स यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते कॢप्तान् वै स लोकान्ध्रुवान्ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति। यावत्संकल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः संकल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवः संकल्पाद्भूय इति संकल्पाद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥

वह जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [विधाताके] रचे हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है। जहाँतक संकल्पकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि संकल्पकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है। [नारद—] 'भगवन्! क्या संकल्पसे भी बढ़कर कुछ है?' [सनत्कुमार—] 'संकल्पसे बढ़कर भी है ही।' [नारद—] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
स यः संकल्पं ब्रह्मेति ब्रह्मबुद्धयोपास्ते कॢप्तान् वै धात्रास्येमे लोकाः फलमिति कॢप्तान् समर्थितान् संकल्पितान्स विद्वान्ध्रुवान् नित्यानत्यन्ताध्रुवापेक्षया ध्रुवश्च स्वयम्। लोकिनो ह्यध्रुवत्वे लोके ध्रुवकॢप्तिर्व्यर्थेति ध्रुवः सन् प्रतिष्ठितानुपकरण-वह जो कि संकल्पकी 'ब्रह्म' इस प्रकार अर्थात् ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता है, कॢप्त— विधाताद्वारा 'इसे ये लोक यानी फल प्राप्त हों' इस प्रकार समर्थित—संकल्पित ध्रुव अर्थात् नित्य लोकोंको, जो अन्य अध्रुव लोकोंकी अपेक्षा ध्रुव हैं, स्वयं ध्रुव होकर, क्योंकि लोकवान् भोक्ताके अध्रुव होनेपर लोकोंमें ध्रुवताकी कल्पना करना व्यर्थ है, अतः ध्रुव होकर; प्रतिष्ठित अर्थात् सामग्री-