छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 741, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 741
खण्ड ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७
यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद्भूय इति चित्ताद्वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥३॥
वह जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है [ अपने लिये ] उपचित हुए ध्रुवलोकोंको स्वयं ध्रुव होकर, प्रतिष्ठित लोकोंको स्वयं प्रतिष्ठित होकर तथा व्यथा न पानेवाले लोकोंको स्वयं व्यथा न पाता हुआ सब प्रकार प्राप्त करता है । जहाँतक चित्तकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि चित्तकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है । [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या चित्तसे बढ़कर भी कुछ है ?' [ सनत्कुमार— ] 'चित्तसे बढ़कर भी है ही । [ नारद— ] 'भगवान् मुझे उसीका उपदेश करें' ॥ ३ ॥
| चित्तानुपचितान्बुद्धिमद्गुणैः<br><br>स चित्तोपासको ध्रुवानित्यादि<br><br>चोक्तार्थम् ॥ ३ ॥ | चित्त अर्थात् बुद्धियुक्त गुणोंसे उपचित ध्रुवलोकोंको वह चित्तोपासक ध्रुव होकर—इत्यादि अर्थ पहले कहे हुएके समान है ॥ ३ ॥ |
|---|
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये
पञ्चमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ५ ॥