भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 978 में से

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पृष्ठ 744
७५०छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

| भवन्ति । निश्चला इव लक्ष्यन्ते न क्षुद्रा इव ।<br><br>अथ ये पुनरल्पाः क्षुद्राः किञ्चिदपि धनादिमहत्त्वैकदेशमप्राप्तास्ते पूर्वोक्तविपरीताः कलहिनः कलहशीलाः पिशुनाः परदोषोद्भासको उपवादिनः परदोषं सामीप्ययुक्तमेव वदितुं शीलं येषां त उपवादिनश्च भवन्ति । | सम्पन्न होते हैं। तथा वे निश्चल-से दिखलायी देते हैं—क्षुद्र पुरुषोंके समान नहीं देखे जाते ।<br><br>और जो अल्प—क्षुद्र अर्थात् धनादि महत्त्वके एक अंशको भी प्राप्त नहीं हैं वे उपर्युक्त मनुष्योंसे विपरीत कलही—कलह करनेवाले, पिशुन—दूसरोंके दोषोंको प्रकट करनेवाले और उपवादी—जिनका दूसरोंके दोषोंको उनके समीप ही कहनेका स्वभाव होता है—ऐसे होते हैं। | | अथ ये महत्त्वं प्राप्ता धनादिनिमित्तं तेऽन्यान् प्रति प्रभवन्तीति प्रभवो विद्याचार्यराजेश्वरादयो ध्यानापादांशा इवेत्याद्युक्तार्थम् । अतो दृश्यते ध्यानस्य महत्त्वं फलतोऽतो भूयश्चित्तादतस्तदुपास्वेत्याद्युक्तार्थम् ॥ १ ॥ | और जो लोग धनादिके कारण महत्त्वको प्राप्त हुए हैं तथा जो दूसरेके प्रति प्रभु होते हैं; प्रभु अर्थात् विद्याचार्य या राजेश्वरादि होते हैं वे मानो ध्यानफलका अंश प्राप्त करनेवाले हैं—ऐसा [ध्यानापादांशका] अर्थ पहले कहा जा चुका है। अतः फलसे भी ध्यानका महत्त्व प्रतीत होता है। इसलिये यह चित्तसे बढ़कर है; अतः तुम इसीकी उपासना करो—ऐसा पूर्ववत् अर्थ समझना चाहिये ॥ १ ॥ |

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