छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 748, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें७४४ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७
वह जो विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है उसे विज्ञानवान् एवं ज्ञानवान् लोकोंकी प्राप्ति होती है। जहाँतक विज्ञानकी गति है वहाँतक उसकी स्वेच्छागति हो जाती है जो कि विज्ञानकी 'यह ब्रह्म है ऐसी उपासना करता है। [ नारद— ] 'भगवन् ! क्या विज्ञानसे भी श्रेष्ठ कुछ है?' [ सनत्कुमार— ] 'विज्ञानसे श्रेष्ठ भी है ही।' ( नारद— ) 'भगवान् मुझे वही बतलावें' ॥ २ ॥
| शृणूपासनफलं विज्ञानवतो विज्ञानं येषु लोकेषु तान्विज्ञानवतो लोकाञ्ज्ञानवतश्चाभिसिध्यत्यभिप्राप्नोति। विज्ञानं शास्त्रार्थविषयं ज्ञानमन्यविषयं नैपुण्यं तद्भिर्युक्ताँल्लोकान् प्राप्नोतीत्यर्थः। यावद्विज्ञानस्येत्यादि पूर्ववत् ॥ २ ॥ | इस उपासनाका फल श्रवण करो—विज्ञानवान् अर्थात् जिन लोकोंमें विज्ञान है उन्हें तथा ज्ञानवान् लोकोंको अभिसिद्ध—प्राप्त कर लेता है। विज्ञान शास्त्रार्थविषयक तथा अन्य विषय-सम्बन्धी निपुणताका नाम है, उनसे सम्पन्न पुरुषोंसे युक्त लोकोंको प्राप्त कर लेता है—ऐसा इसका तात्पर्य है। 'यावद्विज्ञानस्य गतम्' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ पूर्ववत् है ॥ २ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥