भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 763

[खण्ड १२] शाङ्करभाष्यार्थ ७५९


शाङ्करभाष्यम्शाङ्करभाष्यार्थ
सहितस्य तेजसः कारणमिति ततो भूयान् । कथम् ? आकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ तेजोरूपौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निश्च तेजोरूपाण्याकाशेऽन्तः । यच्च यस्यान्र्तवर्ति तदल्पं भूय इतरत् ।<br><br>किञ्चाकाशेनाह्वयति चान्यमन्य आहूतश्चेतर आकाशेन शृणोत्यन्योक्तं च शब्दमन्यः प्रतिशृणोत्याकाशे रमते क्रीडत्यन्योन्यं सर्वस्तस्तथा न रमते चाकाशे वध्वादिवियोग आकाशे जायते न मूर्ते नावष्टब्धे । तथाकाशमभिलक्ष्याङ्कुरादि जायते न प्रतिलोमम् । अत आकाशमुपास्स्व ॥ १ ॥सहित तेजका कारण है, इसलिये उससे बड़ा है। किस प्रकार बड़ा है—आकाशमें ही तेजःस्वरूप सूर्य और चन्द्रमा—ये दोनों हैं तथा आकाशके भीतर ही तेजोमय विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि हैं। जो जिसके भीतर होता है वह छोटा होता है और दूसरा उससे बड़ा होता है।<br><br>इसके सिवा आकाशसे ही एक व्यक्ति दूसरेको पुकारता है; किसीके द्वारा पुकारे जानेपर आकाशसे ही दूसरा पुरुष श्रवण करता है तथा दूसरेके कहे हुए शब्दको आकाशके द्वारा ही अन्य पुरुष श्रवण करता है। सब लोग आकाशमें ही एक दूसरेके साथ रमण—क्रीडा करते हैं और स्त्री *आदिका वियोग हो जानेपर आकाशमें ही (खेदका अनुभव करते हुए) रमण नहीं करते। आकाशमें ही जीव उत्पन्न होता है, मूर्त पदार्थमें या अवरुद्ध स्थानमें नहीं तथा आकाशको लक्ष्य करके ही अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं, विपरीत दशामें नहीं। इसलिये तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥

* 'स्त्री आदि' शब्दसे यहाँ सम्पूर्ण भोग्य वस्तुएँ उपलक्षित हैं। तात्पर्य यह है कि भोग्य पदार्थके प्राप्त होनेपर जो आनन्द होता है उसका भोग आकाशमें ही होता है और उसका वियोग होनेपर जो खेद होता है उसकी अनुभूति भी आकाशमें ही होती है।