भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 800, कुल 978 में से

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पृष्ठ 800

७९६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ७


| क्रीडतीति दर्शनात् । न तथा विदुष । किं तर्ह्यात्मविज्ञाननिमित्तमेवोभयं भवतीत्यर्थः । | करता है' ऐसा प्रयोग देखा जाता है; किंतु विद्वान्‌की क्रीडा ऐसी नहीं होती। तो कैसी होती है ? उसकी तो ये [ रति और क्रीडा ] दोनों ही आत्मविज्ञानके ही कारण होती हैं। | | मिथुनं द्वन्द्वजनितं सुखं तदपि द्वन्द्वनिरपेक्षं यस्य विदुषः । तथात्मानन्दः शब्दादिनिमित्त आनन्दोऽविदुषां न तथास्य विदुषः किं तर्ह्यात्मनिमित्तमेव सर्वं सर्वदा सर्वप्रकारेण च । देहजीवितभोगादिनिमित्तबाह्यवस्तुनिरपेक्ष इत्यर्थः । | मिथुन यह दोसे होनेवाला सुख है, वह भी जिस विद्वान्‌का दोकी अपेक्षासे रहित है [ उसे आत्ममिथुन कहते हैं ]; तथा आत्मानन्द—अविद्वानोंका आनन्द शब्दादि विषयजनित होता है, विद्वान्‌का आनन्द वैसा नहीं होता । तो कैसा होता है ?—वह सारा-का-सारा सर्वदा सब प्रकार आत्माके ही कारण होता है। तात्पर्य यह है कि वह देह, जीवन और भोगादिकी निमित्तभूत बाह्य वस्तुओंकी अपेक्षासे रहित होता है। | | स एवंलक्षणो विद्वाञ्जीवन्नेव स्वाराज्येऽभिषिक्तः पतितेऽपि देहे स्वराडेव भवति । यत एवं भवति तत एव तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति । प्राणादिषु पूर्वभूमिषु तत्रास्येति | इस प्रकारके लक्षणोंवाला वह विद्वान् जीवित रहता हुआ ही स्वाराज्यपर अभिषिक्त हो जाता है तथा देहपात होनेपर भी स्वराट् ही होता है। क्योंकि ऐसा है इसीसे उसकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति होती है। प्राणादि पूर्व भूमिकाओंमें इस उपासककी उनसे परिच्छिन्न ही |