छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 807, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम अध्याय
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प्रथम खण्ड
दहर-पुण्डरीकमें ब्रह्मकी उपासना
| [अष्टमप्रपाठकारम्भप्रयोजनम्]<br><br>यद्यपि दिग्देशकालादिभेदशून्यं ब्रह्म सत्, एकमेवाद्वितीयमात्मैवेदं सर्वमिति षष्ठसप्तमयोरधिगतं तथापीह मन्दबुद्धीनां दिग्देशादिभेदवद्वस्त्वित्येवं भाविता बुद्धिर्न शक्यते सहसा परमार्थविषया कर्तुमित्यनधिगम्य च ब्रह्म न पुरुषार्थसिद्धिरिति तदधिगमाय हृदयपुण्डरीकदेश उपदेष्टव्यः ।<br><br>यद्यपि सत्सम्यक्प्रत्ययैकविषयं निर्गुणं चात्मतत्त्वं तथापि मन्दबुद्धीनां गुणवत्त्वस्येष्टत्वा- | यद्यपि छठे और सातवें अध्यायमें दिशा, देश और कालादि भेदसे रहित ब्रह्म 'सत् एकमात्र अद्वितीय है,' 'आत्मा ही यह सब है'—ऐसा जाना गया है, तथापि 'यहाँ दिशा और देश आदि भेदयुक्त वस्तु है ही'—इस प्रकारकी भावनासे युक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंकी बुद्धि सहसा परमार्थसम्बन्धिनी नहीं की जा सकती और ब्रह्मको जाने बिना पुरुषार्थकी सिद्धि नहीं हो सकती, अतः उसका अनुभव होनेके लिये हृदयकमलरूप देशका उपदेश करना आवश्यक है।<br><br>यद्यपि आत्मतत्त्व सत्, एकमात्र सम्यक् ज्ञानका विषय और निर्गुण है, तो भी मन्दबुद्धि पुरुषोंको उसकी सगुणता ही इष्ट है, इसलिये उसके सत्यसंकल्पादि गुणोंसे युक्त |
छा० उ० २६—