भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 811

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


काशाख्ये यदन्तर्मध्ये तदन्वेष्टव्यम् । तद्भाव तदेव च विशेषेण जिज्ञासितव्यं गुर्वाश्रयश्रवणाद्युपायैरन्विष्य च साक्षात्करणीयमित्यर्थः ॥ १ ॥गया है ] । उस आकाशसंज्ञक तत्त्वके भीतर जो वस्तु है, उसका अन्वेषण करना चाहिये, तथा उसीकी विशेषरूपसे जिज्ञासा करनी चाहिये, अर्थात् गुरुके आश्रय तथा श्रवणादि उपायोंसे अन्वेषण करके उसका साक्षात्कार करना चाहिये—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १ ॥

—:०:—

तं चेद्ब्रूयुर्यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥

उस (गुरु) से यदि [ शिष्यगण ] कहें कि इस ब्रह्मपुरमें जो सूक्ष्म कमलाकार गृह है उसमें जो अन्तराकाश है उसके भीतर क्या वस्तु है जिसका अन्वेषण करना चाहिये अथवा जिसकी जिज्ञासा करनी चाहिये?—तो [ इस प्रकार पूछनेवाले शिष्योंके प्रति ] वह आचार्य यों कहे ॥ २ ॥

तं चेदेवमुक्तवन्तमाचार्यं यदि ब्रूयुरन्तेवासिनश्चोदययुः, कथम् ? यदिदमस्मिन्ब्रह्मपुरे परिच्छिन्नेऽन्तर्दहरं पुण्डरीकं वेश्म ततोऽप्यन्तरल्पतर एवाकाशः । पुण्डरीक एव वेश्मनि तावत्किंइस प्रकार कहनेवाले उस आचार्यसे यदि शिष्यगण कहें अर्थात् शङ्का करें, किस प्रकार शङ्का करें?—इस परिच्छिन्न ब्रह्मपुरमें जो यह अन्तर्वर्ती कमलाकार सूक्ष्म गृह है उसके भीतर तो उससे भी सूक्ष्मतर आकाश है । प्रथम तो उस कमलाकार गृहमें ही क्या वस्तु रह सकती है ? फिर उससे भी