छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 823, कुल 978 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१९
पुण्यकर्मफलोंका अनित्यत्व
| अथान्यो दृष्टान्तस्तत्क्षयं प्रति तद्यथेहेत्यादिः । | अब उस (कर्मफल) के क्षयके लिये 'तद्यथेत्यादि' श्रुतिसे दूसरा दृष्टान्त दिया जाता है— |
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तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहात्मानमननुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान्कामाँस्तेषाँ सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येताँश्च सत्यान् कामाँस्तेषाँसर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥
जिस प्रकार यहाँ कर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक क्षीण हो जाता है उसी प्रकार परलोकमें पुण्योपार्जित लोक क्षीण हो जाता है । जो लोग इस लोकमें आत्माको और इन सत्य कामनाओंको बिना जाने ही परलोकगामी होते हैं उनकी सम्पूर्ण लोकोंमें यथेच्छगति नहीं होती और जो इस लोकमें आत्माको तथा सत्य कामनाओंको जानकर [ परलोकमें ] जाते हैं उनकी समस्त लोकोंमें यथेच्छगति होती है ॥ ६ ॥
| तत्तत्र यथेह लोके तासामेव स्वाम्यनुशासनानुवर्तिनीनां प्रजानां सेवादिजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयतेऽन्तवान्भवति । अथेदानीं दार्ष्टान्तिकमुपसंहरति एवमेवामुत्राग्निहोत्रादिपुण्यजितो लोकः पराधीनोपभोगः क्षीयत एवेति । उक्तो दोष | सो जिस प्रकार इस लोकमें अपने स्वामीके अनुशासनका अनुवर्तन करनेवाली उन प्रजाओंका सेवादि-कर्मसे प्राप्त किया हुआ यह लोक, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण-अन्तवान् हो जाता है—अब श्रुति दार्ष्टान्तका उपसंहार करती है—उसी प्रकार परलोकमें अग्निहोत्रादि पुण्यकर्मसे प्राप्त किया हुआ लोक भी, जिसका उपभोग पराधीन है, क्षीण ही हो जाता है । उक्त दोष |
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