भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 831

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८२७

| ड्यते । तन्निमित्तं सत्यानां कामानाम् अप्राप्तिरित्यापिधानमिवापिधानम् ।<br><br>कथमनृतापिधाननिमित्तं तेषामलाभः ? इत्युच्यते; यो यो हि यस्मादस्य जन्तोः पुत्रो भ्राता वेष्ट इतोऽस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते तमिष्टं पुत्रं भ्रातरं वा स्वहृदयाकाशे विद्यमानमपीह पुनर्दर्शनायेच्छन्नपि न लभते ॥ १ ॥ | कारण सत्यकामनाओंकी प्राप्ति नहीं होती इसलिये वह अपिधानके समान अपिधान है [ वास्तविक अपिधान नहीं है ] ।<br><br>मिथ्या अपिधानके कारण उनकी प्राप्ति किस प्रकार नहीं होती, सो बतलाया जाता है; क्योंकि इस जीवका जो-जो पुत्र, भाई अथवा इष्ट इस लोकसे मरकर जाता है, अपने हृदयाकाशमें विद्यमान रहनेपर भी उस इष्ट, पुत्र अथवा भाईको वह इच्छा करनेपर भी इस लोकमें फिर देखनेको नहीं पाता ॥ १ ॥ |


-: ० :-

अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥

तथा उस लोकमें अपने जिन जीवित अथवा जिन मृतक [पुत्रादि] को और जिन अन्य पदार्थोंको यह इच्छा करते हुए भी प्राप्त नहीं करता उन सबको यह इस (हृदयाकाशस्थित ब्रह्म) में जाकर प्राप्त कर लेता है; क्योंकि यहाँ इसके ये सत्यकाम अनृतसे ढके हुए रहते हैं । इस विषयमें यह दृष्टान्त है--जिस प्रकार पृथिवीमें गड़े हुए सुवर्णके खजानेको