भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 836, कुल 978 में से

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पृष्ठ 836

८३२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८


संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
जातं कालुष्यं जहातीति सम्प्रसादशब्दो यद्यपि सर्वजन्तूनां साधारणस्तथाप्येवं वित्स्वर्गं लोकमैतीति प्रकृतत्वादेष सम्प्रसाद इति संनिहितवद्यत्नविशेषात् ।कालिमाको त्याग देता है; इसलिये यद्यपि 'सम्प्रसाद' शब्द सम्पूर्ण जीवोंके लिये साधारण है, तो भी 'इस प्रकार जाननेवाला स्वर्गलोकको प्राप्त होता है' ऐसा [विद्वत्सम्बन्धी] प्रकरण होनेके कारण 'एष सम्प्रसादः' यह प्रयोग इस विद्वान्‌के लिये ही आया है; क्योंकि यहाँ संनिहितके समान विशेष यत्न किया गया है। *
सोऽथेदं शरीरं हित्वास्माच्छरीरात्समुत्थाय शरीरात्मभावनां परित्यज्येत्यर्थः । न त्वासनादिव समुत्थायेतीह युक्तम्; स्वेन रूपेणेति विशेषणात् । न ह्यन्यत उत्थाय स्वरूपं सम्पत्तव्यम् । स्वरूपमेव हि तन्न भवति प्रतिपत्तव्यं चेत्स्यात् । परं परमात्मलक्षणं विज्ञप्तिस्वभावं ज्योति-इस प्रकारका विवेक होनेके पश्चात् वह विद्वान् इस शरीरको त्यागकर इस शरीरसे उत्थान कर अर्थात् देहात्मबुद्धिको त्यागकर—यहाँ 'आसनसे उठनेके समान शरीरसे उठकर' ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है, क्योंकि 'स्वेन रूपेण' (अपने स्वरूपसे ) ऐसा विशेषण दिया गया है और अपने स्वरूपकी प्राप्ति किसी अन्य स्थानसे उत्थान करके की नहीं जाती, क्योंकि यदि वह प्राप्तव्य हो तो स्वरूप ही नहीं हो सकता—पर अर्थात् परमात्म-लक्षण विज्ञप्तिस्वरूप ज्योतिको प्राप्त

* 'एष सम्प्रसादः' में जो 'एषः' शब्दका प्रयोग किया हुआ है वही यत्न-विशेष है। जो वस्तु समीप होती है उसीके लिये 'एषः' ( यह ) का प्रयोग किया जाता है, अतः 'सम्प्रसाद' शब्दसे यद्यपि सामान्यतः सभी जीवोंका ग्रहण हो सकता है तथापि 'एषः' रूप विशेष यत्न होनेके कारण तीसरे मन्त्रमें कहे हुए प्रकरण-प्राप्त विद्वान्‌के लिये ही प्रयुक्त हुआ है क्योंकि वही समीप है।