छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 838, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ८ |
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| अथ किमर्थमिदं नाम पुनरुच्यते ?<br><br>तदुपासनविधिस्तुत्यर्थम् ॥ ४ ॥ | चुका है । किंतु यह नाम किस-लिये कहा गया है ? [ इसपर कहते हैं—] उसकी उपासना-विधिकी स्तुतिके लिये ॥ ४ ॥ |
तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सतीयमिति तद्यत्सत्तदमृतमथ यत्ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद्यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥ ५ ॥
वे ये 'सकार', 'तकार' और 'यम्' तीन अक्षर हैं । उनमें जो 'सकार' है वह अमृत है, जो 'तकार' है वह मर्त्य है और जो 'यम्' है उससे वह दोनोंका नियमन करता है; क्योंकि इससे वह उन दोनोंका नियमन करता है इसलिये 'यम्' इस प्रकार जाननेवाला प्रतिदिन ही स्वर्गलोकको जाता है ॥ ५ ॥
| तानि ह वा एतानि ब्रह्मणो नामाक्षराणि त्रीण्येतानि सतीयमिति सकारस्तकारो यमिति च । ईकारस्तकार उच्चारणार्थोऽनुबन्धः;ह्रस्वेनैवाक्षरेण पुनः प्रतिनिर्देशात् । तेषां तत्तत्र यत्सत्सकारस्तदमृतं सद्ब्रह्म; अमृतवाचकत्वादमृत एव सकारस्तकारान्तो निर्दिष्टः । अथ यत्ति तका- | वे ये ब्रह्मके तीन नामाक्षर हैं 'स', 'ती' और 'यम' अर्थात् सकार, तकार और यम् हैं । तकारमें जो ईकार है वह उच्चारणमात्रके लिये अनुबन्ध है, क्योंकि पीछे ह्रस्व [ इकार ] से ही उसका निर्देश किया गया है । उनमेंसे वहाँ जो सत् यानी सकार है वह अमृत है—सद् ब्रह्म है । अमृतका वाचक होनेके कारण अमृतरूप सकारका ही तकारान्त निर्देश किया गया है । तथा जो 'ति' यानी तकार है |