भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 978 में से

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पृष्ठ 840

चतुर्थ खण्ड

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सेतुरूप आत्माकी उपासना

अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्मेदाय नैतꣳसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतꣳसर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥

जो आत्मा है वह इन लोकोंके असम्भेद (पारस्परिक असंघर्ष) के लिये इन्हें विशेषरूपसे धारण करनेवाला सेतु है। इस सेतुका दिन-रात अतिक्रमण नहीं करते। इसे न जरा, न मृत्यु, न शोक और न सुकृत या दुष्कृत ही प्राप्त हो सकते हैं। सम्पूर्ण पाप इससे निवृत्त हो जाते हैं, क्योंकि यह ब्रह्मलोक पापशून्य है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अथ य आत्मेति। उक्तलक्षणो यः सम्प्रसादस्तस्य स्वरूपं वक्ष्यमाणैरुक्तैरनुक्तैश्च गुणैः पुनः स्तूयते ब्रह्मचर्यसाधनसम्बन्धार्थम्। य एष यथोक्तलक्षण आत्मा स सेतुरिव सेतुः। विधृतिर्विधरणः। अनेन हि सर्वं जगद्वर्णाश्रमादिक्रियाकारकफलादिभेदनियमैःउपर्युक्त लक्षणवाला जो सम्प्रसाद है उसके स्वरूपकी आगे कहे जानेवाले, पहले कहे हुए तथा बिना कहे हुए गुणोंसे ब्रह्मचर्यरूप साधनसे सम्बन्ध करानेके लिये पुनः स्तुति की जाती है। यह जो उपर्युक्त लक्षणोंवाला आत्मा है वह सेतुके समान सेतु है; विधृति—विशेषतः धारण करनेवाला है। कर्ता (जीव) के अनुरूप विधान करनेवाले इस आत्माके द्वारा ही सारा जगत् वर्णाश्रमादि क्रिया, कारक और