भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 843

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८३९

यस्माच्च पाप्मकार्यमान्ध्यादि-<br>शरीरवतः स्यान्न त्वशरीरस्य—क्योंकि पापके कार्य अन्धत्वादि<br>शरीरवान्‌को ही होते हैं, अशरीर-<br>को नहीं—

तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतꣳ सेतुं तीर्त्वापि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यते सकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥ २ ॥

इसलिये इस सेतुको तरकर पुरुष अन्धा होनेपर भी अन्धा नहीं होता, विद्ध होनेपर भी अविद्ध होता है, उपतापी होनेपर भी अनुपतापी होता है, इसीसे इस सेतुको तरकर अन्धकाररूप रात्रि भी दिन ही हो जाती है, क्योंकि यह ब्रह्मलोक सर्वदा प्रकाशस्वरूप है॥ २ ॥

तस्माद्वा एतमात्मानं सेतुं तीर्त्वा प्राप्यानन्धो भवति देहवत्त्वे पूर्वमन्धोऽपि सन्। तथा विद्धः सन्देहवत्त्वे स देहवियोगे सेतुं प्राप्याविद्धो भवति। तथोपतापी रोगाद्युपतापवान्सन्ननुपतापी भवति। किञ्च यस्मादहोरात्रे न स्तः सेतौ तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वा प्राप्य नक्तमपि तमोरूपं रात्रिरपि सर्वमहरेवा-इसीसे सेतुरूप इस आत्माको तरकर-प्राप्त होकर देहवान् होनेके समय पहले अन्धा होनेपर भी-अनन्ध हो जाता है। इसी प्रकार देहवान् होनेके समय विद्ध होनेपर भी देहका वियोग होनेपर इस सेतुको प्राप्त होकर अविद्ध हो जाता है तथा [ देहवान् होनेके ही समय ] उपतापी-रोगादि उपताप वाला होनेपर भी अनुपतापी हो जाता है। इसके सिवा क्योंकि इस [ आत्मारूप ] सेतुमें दिन-रातका अभाव है इसलिये इस सेतुको तरकर-प्राप्त होकर नक्त-तमोरूपा रात्रि भी सम्पूर्ण दिन ही