भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 869

सप्तम खण्ड

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आत्मतत्त्वका अनुसंधान करनेके लिये इन्द्र और
विरोचनका प्रजापतिके पास जाना

| अथ य एष सम्प्रसादोऽस्मा-<br>च्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरु-<br>पसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत<br>एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभ-<br>यमेतद्ब्रह्मेत्युक्तम् । तत्र कोऽसौ<br>सम्प्रसादः ? कथं वा तस्याधि-<br>गमः ? यथा सोऽस्माच्छरीरात्स-<br>मुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन<br>रूपेणाभिनिष्पद्यते, येन स्वरूपेणा-<br>भिनिष्पद्यते स किंलक्षण आत्मा ?<br>सम्प्रसादस्य च देहसम्बन्धीनि<br>रूपाणि ततो यदन्यत्कथं स्वरूप-<br>मित्येतेऽर्था वक्तव्या इत्युत्तरो<br>ग्रन्थ आरभ्यते । आख्यायिका | ‘अथ यह जो सम्प्रसाद है, जो<br>इस शरीरसे सम्यक् रूपसे उत्थान<br>कर परम ज्योतिको प्राप्त होकर<br>अपने स्वरूपसे निष्पन्न होता है यह<br>आत्मा है— ऐसा [ आचार्यने ]<br>कहा । यह अमृत है, यह अभय है,<br>यह ब्रह्म है’ ऐसा [ पहले दहर<br>विद्याके प्रसङ्गमें ] कहा जा चुका<br>है । सो इस प्रसङ्गमें यह सम्प्रसाद<br>कौन है और उसकी प्राप्ति कैसे<br>होती है ? यह जिस प्रकार इस<br>शरीरसे उत्थानकर परम ज्योतिको<br>प्राप्त हो अपने स्वरूपसे निष्पन्न<br>होता है और जिस रूपसे निष्पन्न<br>होता है वह आत्मा कैसे लक्षणवाला<br>है ? सम्प्रसादके जो [ सविशेष ]<br>रूप हैं वे तो देहसम्बन्धी हैं, उनसे<br>भिन्न जो उसका [ निर्विशेष ]<br>रूप है वह कैसा है ?—ये सब<br>बातें बतलानी हैं, इसीलिये आगेका<br>ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है ।<br>यहाँ जो आख्यायिका है वह तो<br>विद्याके ग्रहण और दान करनेकी |