भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 892
८८८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ८
प्रजापतिना यदर्थो न्याय उक्तस्तदेकदेशो मघवतः प्रत्यभाद्बुद्धौ, येन च्छायात्मग्रहणे दोषं ददर्श ।करनेके लिये जो व्यभिचारित्वरूप ] न्याय प्रदर्शित किया था उसका एकदेश इन्द्रकी बुद्धिमें स्फुरित हुआ, जिससे कि उन्हें छायाको आत्मरूपसे ग्रहण करनेमें दोष दीखने लगा ।
कथम् ? यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलंकृते छायात्मापि साध्वलंकृतो भवति सुवसने च सुवसनः परिष्कृते परिष्कृतो यथानखलोमादिदेहावयवापगमे छायात्मापि परिष्कृतो भवति नखलोमादिरहितो भवति; एवमेवायं छायात्माप्यस्मिञ्छरीरे नखलोमादिभिर्देहावयवत्वस्य तुल्यत्वादन्धे चक्षुषोपगमेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः । स्रामः किलैकनेत्रस्तस्यान्धत्वेन गतत्वात् । चक्षुर्नासिका वा यस्य सदा स्रवति स स्रामः । परिवृक्णश्छिन्न-कैसा दोष दिखायी दिया ?—जिस प्रकार निश्चय ही इस शरीरके अच्छी तरह अलंकृत होनेपर यह छायात्मा अच्छी तरह अलंकृत हो जाता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत होता है अर्थात् नखलोमादि शरीरके अवयवोंकी निवृत्ति होनेपर छायात्मा भी परिष्कृत — नखलोमादिरहित हो जाता है; उसी प्रकार यह छायात्मा भी—इस शरीरमें नखलोमादिसे चक्षुआदिकी देहावयवत्वमें समानता होनेके कारण [ शरीरके ] अंधे होनेपर अंधा हो जाता है, स्राम होनेपर स्राम हो जाता है। स्रामका प्रसिद्ध अर्थ एक नेत्रवाला है, किंतु वह अन्धत्वसे ही गतार्थ हो जाता है इसलिये जिसके चक्षु या नासिका सदा स्रवित होते रहते हैं उसे 'स्राम' समझना चाहिये । परिवृक्ण—जिसके हाथ या पैर