छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 897, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८१३
| एतमेवात्मानं तु ते भूयः पूर्वं व्याख्यातमप्यनुव्याख्यास्यामि। यस्मात्सकृद्व्याख्यातं दोषरहितानामवधारणविषयं प्राप्तमपि नाग्रहीस्तः केनचिद्दोषेण प्रतिबद्धग्रहणसामर्थ्यस्त्वमतस्तत्क्षपणाय वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीत्युक्त्वा तथोषितवते क्षपितदोषाय तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ | आत्माका वर्णन किया है, पहले व्याख्या किये हुए उस आत्माकी ही मैं तुम्हारे प्रति पुनः व्याख्या करूँगा। क्योंकि यद्यपि दोषरहित पुरुषोंको वह एक बार व्याख्या करनेपर ही ज्ञानका विषय हो जाता है तथापि तुम उसे ग्रहण नहीं कर सके। इसलिये किसी दोषसे तुम्हारी ग्रहणशक्ति प्रतिबद्ध है। उसकी निवृत्तिके लिये तुम अगले बत्तीस वर्ष यहाँ और ब्रह्मचर्यवास करो।' ऐसा कहकर, उसी प्रकार निवास करनेवाले क्षीणदोष इन्द्रसे प्रजापतिने कहा ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषद्यष्टमाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥