छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 903, कुल 978 में से
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| खण्ड १० ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ८९९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| निमित्तमप्रियवेत्तेव भवति। अपि च स्वयमपि रोदितीव। | कारण मानो वह अप्रिय अनुभव करनेवाला होता है तथा वह स्वयं भी मानो रोता है। |
| नन्वप्रियं वेत्त्येव कथं वेत्तेवेति उच्यते ? | शङ्काः—किंतु वह तो अप्रिय जानता ही है, फिर उसे 'मानो अप्रिय जाननेवाला हो' ऐसा क्यों कहा जाता है ? |
| न; अमृताभयत्ववचनानुपपत्तेः। "ध्यायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) इति च श्रुत्यन्तरात्। | समाधान—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि इससे उसका अमृतत्व और अभयत्वप्रतिपादन अनुपपन्न होगा तथा "मानो ध्यान करता है" ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है। |
| ननु प्रत्यक्षविरोध इति चेत् ? | शङ्का—किंतु ऐसा माननेसे तो प्रत्यक्ष अनुभवसे विरोध आता है। |
| न; शरीरात्मत्वप्रत्यक्षवद्भ्रान्तिसम्भवात्। | समाधान—नहीं, क्योंकि शरीर ही आत्मा है इस प्रत्यक्ष अनुभवके समान यह (अप्रियवेदनादि) भी भ्रान्तिजनित है। |
| तिष्ठतु तावदप्रियवेत्तेव न वेति; नाहमत्र भोग्यं पश्यामि। | वह मानो अप्रियवेत्ता हो अथवा न हो, यह बात अलग रहे, मुझे इसमें कोई भोग्य (फल) दिखायी नहीं देता। |
| स्वप्नात्मज्ञानेऽपीष्टं फलं नोपलभ इत्यभिप्रायः। | तात्पर्य यह है कि स्वप्नशरीरको आत्मा माननेमें भी मुझे इच्छित फल प्राप्त नहीं होता। |
| एवमेवैष तवाभिप्रायेणेति | [प्रजापतिने कहा—] 'आत्माका अमृत और अभय गुणवान् होना |
छा० उ० २९—