छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 906, कुल 978 में से
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९०२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ८
| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| द्रष्टा स्वप्ने च महीयमानश्चरति स एष सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति स्वाभिप्रेतमेव । | हुआ विचरता है, वह जब सो जानेपर दर्शनवृत्तिसे रहित और अत्यन्त आनन्दित होकर स्वप्न नहीं देखता तो वही आत्मा है यह अमृत और अभय है और यही ब्रह्म है' इस प्रकार प्रजापतिने अपने अभिप्रायके अनुसार ही आत्माका स्वरूप बतलाया । |
| मघवांस्तत्रापि दोषं ददर्श । | किंतु इन्द्रने उसमें भी दोष देखा । |
| कथम् ? नाह नैव सुषुप्तस्थोऽप्यात्मा खल्वयं सम्प्रति सम्यगिदानीं चात्मानं जानाति नैवं जानाति । कथम् ? अयमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि चेति, यथा जाग्रति स्वप्ने वा । अतो विनाशमेव विनाशमिवेति पूर्ववद्द्रष्टव्यम् । अपीतोऽपिगतो भवति विनष्ट इव भवतीत्यभिप्रायः । | सो किस प्रकार ?—'यह सुषुप्तस्थ आत्मा भी इस अवस्था में निश्चय ही अपनेको इस प्रकार नहीं जानता ।' किस प्रकार नहीं जानता ?— कि 'मैं यह हूँ' और न यह अन्य भूतोंको ही जानता है; जैसा कि यह जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें जानता था । अतः यह मानो विनाशको अपीत—प्राप्त हो जाता है; तात्पर्य यह है कि विनष्ट-सा हो जाता है । यहाँ पूर्ववत् 'विनाशमेव' के स्थानमें 'विनाशमिव' ऐसा समझना चाहिये । |
| ज्ञाने हि सति ज्ञातुः सद्भावोऽवगम्यते नासति ज्ञाने । न च सुषुप्तस्य ज्ञानं दृश्यतेऽतो विनष्ट इवेत्यभिप्रायः । न तु | ज्ञान होनेपर ही ज्ञाताकी सत्ता जानी जाती है, ज्ञानके अभावमें नहीं जानी जाती; और सुषुप्त पुरुषको ज्ञान होना देखा नहीं जाता । अतः तात्पर्य यह है कि उस समय यह नष्ट-सा हो जाता है । अमृत और |