छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 909, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५
| शिष्टा एकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवासेति । तदेतद्द्वात्रिंशतमित्यादिना दर्शितमित्याख्यायिकातोऽपसृत्य श्रुत्योच्यते । एवं किलैतदिन्द्रत्वादपि गुरुतरमिन्द्रेणापि महता यत्नेनैकोत्तरवर्षशतकृतायासेन प्राप्तमात्मज्ञानमतो नातः परं पुरुषार्थान्तरमस्तीत्यात्मज्ञानं स्तौति ॥ ३ ॥ | हैं कि इन्द्रने प्रजापतिके यहाँ एक सौ एक वर्ष ब्रह्मचर्यवास किया। यह बात 'द्वात्रिंशतम्' इत्यादि वाक्योंसे कही गयी है, अतः श्रुतिने आख्यायिकासे कुछ हटकर इसे स्वयं भी कह दिया है। इस प्रकार जो इन्द्रत्वसे भी गुरुतर है ऐसे इस आत्मज्ञानको इन्द्रने भी एक सौ एक वर्षतक किये हुए परिश्रमसे बड़े यत्नपूर्वक प्राप्त किया था, अतः इससे बढ़कर और कोई पुरुषार्थ नहीं है—इस प्रकार श्रुति आत्मज्ञानकी स्तुति करती है ॥ ३ ॥ |
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इतिच्छान्दोग्योपनिषदष्टमाध्याये एकादशखण्ड-
भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ११ ॥