छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 99, कुल 978 में से
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खण्ड ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| तस्यैवं सर्वतः सुवर्णवर्णस्याप्य- | इस प्रकार · सब ओरसे सुवर्ण- |
| वर्ण होनेपर भी उसके नेत्रोंमें एक | |
| क्ष्णोर्विशेषः । कथम् ? तस्य | विशेषता है । किस प्रकार ? उस |
| देवके, जैसा कि कप्यास होता है | |
| यथा कपेर्मर्कटस्यासः कप्यासः, | उसके सदृश लाल पुण्डरीक (कमल)के |
| समान अत्यन्त तेजस्वी नेत्र हैं। कपि- | |
| आसेरुपवेशनार्थस्य करणे घञ्, | मर्कट (बंदर) के आसका नाम |
| कप्यास है; उपवेशन (बैठने) अर्थके | |
| कपिपुष्ठान्तो येनोपविशति । | वाचक 'आस्' धातुसे करणमें 'घञ्' |
| प्रत्यय होनेपर 'आस' शब्द सिद्ध | |
| कप्यास इव पुण्डरीकमत्यन्त- | होता है । अतः 'कप्यास' का अर्थ |
| वानरकी पीठका अन्तिम भाग (गुदा) | |
| तेजस्वि, एवमस्य देवस्या- | है, जिससे कि वह बैठता है । |
| [यहाँ 'पुण्डरीक' को 'कप्यास' से | |
| क्षिणी । उपमितोपमानत्वान्न | उपमित किया गया है और नेत्रोंको |
| पुण्डरीककी उपमा दी गयी है; इस | |
| हीनोपमा । | प्रकार] उपमितोपमान होनेके कारण |
| यह हीनोपमा नहीं है । | |
| तस्यैवं गुणविशिष्टस्य गौण- | ऐसे गुणवाले उस आदित्यान्तर्गत |
| मिदं नामोदिति। कथं गौणत्वम् ? | पुरुषका 'उत' यह गौण नाम है । |
| इसकी गौणता किस-प्रकार है ? | |
| स एष देवः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यः | वह यह देव सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् |
| पाप्मना सह तत्कार्येभ्य इत्यर्थः। | पापोंसहित उनके कार्योंसे उदित |
| अर्थात् ऊपर गया हुआ है, इसलिये | |
| 'य आत्मापहतपाप्मा' इत्यादि | वह 'उत' नामवाला है । जैसा कि |
| वक्ष्यति । उदित उद् इत उद्गत | 'जो आत्मा पापसे हटा हुआ है' |
| इत्यादिरूपसे श्रुति आगे कहेगी । | |
| इत्यर्थः, अतोऽसावुन्नामा । | ऐसे गुणसे युक्त उस 'उत' नामवाले |
| तमेवंगुणसंपन्नमुन्नामानं यथोक्तेन | पुरुषको जो पूर्वोक्त प्रकारसे जानता |
| प्रकारेण यो वेद सोऽप्येवमेवो- | है वह भी इसी प्रकार सम्पूर्ण |