भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० ५ ] सूत्रस्थानम् ८३ रत्न आभूषण आदि धारण करने से लाभ— धन्यं मङ्गलमायुष्यं श्रीमद्द्व्यसन-सूदनम् ॥ ६५ ॥ हर्षणं काम्यमोजस्यं रत्नाऽऽभरण-धारणम् । रत्न हीरे आदि, आभरण इनसे या स्वर्ण आदि से बने आभूषण धारण करना धन्य अर्थात् भाग्यवान्, धनी होने का चिह्न है । इनका धारण करना मङ्गलकारी, दीर्घायु देने वाला एवं शोभा बढ़ाता है । इनके धारण करने से सब व्यसन, सर्प कांटादि की विपत्ति नष्ट हो जाती है । आभूषण इत्यादि को धारण करने से मन प्रसन्न होता है, सुन्दरता आती है और ओज, तेज, कांति बढ़ती है ॥ ६५ ॥ दीर्घायु के लिये आवश्यक शौच कर्म— मेध्यं पवित्रमायुष्यमलक्ष्मीक-विनाशनम् ॥ ६६ ॥ पाद्योर्मलमार्गाणां शौचाधानमभीक्ष्णशः । बार-बार मल त्याग आदि के पीछे शुद्धि करने से अर्थात् पवित्र रहने से मेधा बुद्धि बढ़ती है, पवित्रता, दीर्घायु मिलती है और दरिद्रता एवं कलि (पाप या दुःख) का नाश होता है। इसलिए पांव और मल मार्ग गुद और उपस्थ, और शिर के सात छिद्र—दो नाक, दो कान, दो आंख और एक मुख इन सातों छेदों को बार-बार साफ करना चाहिये ॥ ६६ ॥ पौष्टिकं वृष्यमायुष्यं शुचि रूप-विराजनम् ॥ ६७ ॥ केश-श्मश्रु-नखादीनां कल्पनं संप्रसाधनम् । केश (शिर के बाल), श्मश्रु (दाढ़ी मूंछ) और नख आदि का काटना और इनका प्रसाद, श्रृंगार करने से पुष्टि, पुरुषत्व, दीर्घायु मिलती है एवं रूप भी सुन्दर, पवित्र बन जाता है ॥ ६७ ॥ जूता पहिनने का गुण— चक्षुष्यं स्पर्शनहितं पादयोर्व्यसनापहम् ॥ ६८ ॥ बल्यं पराक्रमसुखं वृष्यं पादत्रधारणम् । जूता पहिनना आँखों के लिये हितकारी, त्वचा के लिये लाभकारी, एवं कीड़े आदि से बचाता है और बल पराक्रम, सुख और पुरुषत्व को देता है ॥६८॥ छत्र धारण का गुण— ईतेः प्रशमनं बल्यं गुप्त्यावरणसंकरम् ॥ ६९ ॥ घर्मानिलरजोऽम्बुघ्नं छत्रधारणमुच्यते । छत्र धारण करना भावी दुःख को शान्त करने वाला, बलकारक, बुरे