चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६१ मणियों से शोभित होकर पलंग पर सोये । जङ्गलों को, ठण्डे पानी ( झरने आदि ) को और फूलों को ग्रीष्म काल में सेवन करे। ग्रीष्म ऋतु में मैथुन से अलग रहे ॥ २७-३२ ॥ वर्षा काल की ऋतुचर्या— आदान-दुर्बले देहे पक्ता भवति दुर्बलः । स वर्षास्वनिलादीनां दूषणैर्बाध्यते पुनः ॥ ३३ ॥ भू-बाष्पाम्भेघ-निष्यन्दात्पाकादम्लाज्जलस्य च । वर्षास्वग्निबले क्षीणे कुप्यन्ति पवनादयः ॥ ३४ ॥ तस्मात्साधारणः सर्वो विधिर्वर्षामु शस्यते । उदमन्थं दिवास्वप्नमवश्यायं नदीजलम् ॥ ३५ ॥ व्यायाममातपं चैव व्यवायं चात्र वर्जयेत् । पान-भोजन-संस्कारान् प्रायः क्षौद्रान्वितान् भजेत् ॥ ३६ ॥ व्यक्ताम्ल-लवण-स्नेहं वात-वर्षाकुलेऽहनि । विशेपशीते भोक्तव्यं वर्षास्वनिल-शान्तये ॥ ३७॥ अग्निं संरक्षणवता यव-गोधूम-शालयः । पुराणा जाङ्गलेर्मासैर्भाज्या यूषैश्च संस्कृतैः ॥ ३८ ॥ पिवेत्क्षौद्रान्वितं चाल्पं मार्द्वीकारिष्टमम्बु वा । माहेन्द्रं तप्तशीतं वा कौपं सारसमेव वा । प्रघर्षोद्वर्तन-स्नान-गन्ध-माल्य-परो भवेत् । लघुशुद्धाम्बरः स्थानं भजेदक्लेदि वार्षिकम् ॥ ४० ॥ आदान काल में शरीर के निर्बल होने से अग्नि भी निर्बल हो जाती है । यह अग्नि वर्षा ऋतु में वायु, पित्त, कफ तीनों के दूषणों से दूषित हो जाती है । ग्रीष्म ऋतु में प्रचण्ड सूर्य की गरमी से भूमि के तप जाने से, वर्षा में बरसात पड़ने से, पानी के स्पर्श से, भूमि में से गरम भाप के निकलने से तीनों दोष कुपित हो जाते हैं, इसी प्रकार बादलों के बरसने से वात, कफ कुपित होते हैं, जल के अम्लपाक होने से पित्त कुपित होता है । वर्षा ऋतु में अग्नि-बल के क्षीण होने से वात, पित्त कफ तीनों कुपित हो जाते हैं । इसलिये वर्षा में साधा- रण विधि का पालन करना चाहिये । पानी में घुला सत्तू, दिन में सोना, ओस, नदी का पानी, सम्भोग-मैथुन, धूप और व्यायाम इस ऋतु में नहीं सेवन करने