चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ] सूत्रस्थानम् ६३ का मांस, क्षार, दही दिन में सोना सामने मे आती हुई वा पुरवा वायु का त्याग करना चाहिये । ४१-४५ ॥ हंसोदक का लक्षण— दिवा सूर्यांश-सन्तप्तं निशि चन्द्रांशु-शीतलम् । कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषीकृतम् ॥ ४६ ॥ हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचि । स्नानपानावगाहेषु हितमम्बु यथाऽमृतम् ॥ ४७ ॥ शारदानि च माल्यानि वासांसि विमलानि च । शरत्काले प्रशस्यन्ते प्रदोषे चेन्दुरश्मयः ॥ ४८ ॥ दिन में सूर्य की किरणों से गरम और रात्रि मे चन्द्रमा की शीतल किरणों से ठण्डा होने वाला कालस्वभाव से पका हुआ अर्थात् वर्षा का जल जिसमें न रहा हो; इससे दोष रहित; अगस्त्य नक्षत्र के उदय होने के प्रभाव से निर्मल, ( विष रहित ) पानी को हंसोदक ( चन्द्रार्क ) कहते हैं । यह हंसोदक शरद् ऋतु में निर्मल और पवित्र है । इसलिये स्नान कार्य मे, पीने मे, अवगाहन, पानी में बैठने आदि कार्यों मे उत्तम और अमृत के समान है । शरत्काल में रात्रि के प्रथम प्रहर में चन्द्रमा की किरणों का सेवन करना तथा शरत् कालीन मालायें, और निर्मल वस्त्र प्रशस्त हैं ॥ ४६-४८ ॥ इत्युक्तमृतुसात्म्यं यच्चेष्टाऽऽहार-व्यपाश्रयम् । उपशेते यदौचित्यादोकःसात्म्यं तदुच्यते ॥ ४६ ॥ देशनामामयानां च विपरीतगुणं गुणैः । सात्म्यमिच्छन्ति सात्म्यज्ञाश्चेष्टितं चायमेव च ॥ ५० ॥ ( चेष्टा ) क्रिया और आहार, खान विहार के आश्रित अर्थात् ऋतुओं के अनुकूल जो कर्म हैं, वे कह दिये । पुरुष की प्रकृति के अनुसार जो उचित अनुकूल पड़ता है, उसे 'ओकः-सात्म्य' कहते हैं । जो आहार या विहार देश ( जांगल आनूप और साधारण ) एवं रोग इनके गुणों से विपरीत, गुण वाले होते हैं उस आहार विहार को 'सात्म्य' को जानने वाले विद्वान् 'सात्म्य' कहते हैं ॥ ४६-५० ॥ तत्र श्लोकाः— ऋतावृत्तौ नृभिः सेव्यमसेव्यं यच्च किञ्चन । तस्याशितीये निर्दिष्टं हेतुमत्सात्म्यमेव च ॥ ५१ ॥ प्रत्येक ऋतु में मनुष्यों को क्या २ सेवन करना चाहिये और क्या २ नहीं