चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१०४ चरकसंहिता [ अ० ७ आगन्तुज रोगों के प्रतीकार— त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः । देश-कालात्म-विज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्त्तनम् ॥ ५३ ॥ आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः । प्राज्ञः प्रागेव तत्कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥ ५४ ॥ आप्तोपदेश-प्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्च कारणम् । विकाराणामनुत्पत्तावुपन्नानाञ्च शान्तये ॥ ५५ ॥ आगन्तुज एवं मानसिक रोग बुद्धि के दोष से उत्पन्न होते हैं, इस लिये इस प्रज्ञापराध को छोड़ना चाहिये । इन्द्रियों को विषयों से रोकना बुद्धि, स्मृति, भगवान् का स्मरण, देश काल और आत्मा का चिन्तन, (सद्वृत्त) सच्चे, कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करना, यह विधि आगन्तुज रोगों की उत्पत्ति से बचने का मार्ग है । इस प्रकार बरतने से आगन्तुज रोग उत्पन्न नहीं होते । बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने लिये जो हितकारी काम हो उनको रोगो- त्पत्ति से पूर्व ही करे । (आप्तोपदेश) रजस् और तमस् से मुक्त निर्भ्रान्त विद्वानों के उपदेश और (प्रज्ञान) बुद्धि से सिद्ध, प्रमाण द्वारा सिद्ध किये, बुद्धि से स्वीकार किये ये दोनों मानसिक विकारों की अनुत्पत्ति में तथा उत्पन्न विकारों की शान्ति में कारण है ॥ ५३-५५ ॥ वर्जने योग्य मनुष्य— पाप-वृत्त-वचःसत्त्वाः सूचकाः कलह-प्रियाः । मर्मोपहासिनो लुब्धाः पर-वृद्धि द्विषः शठाः ॥ ५६ ॥ परापवाद-रतयश्चपला रिपु-सेविनः । निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥ जिनकी वाणी और मन पापमय हों, चुगलखोर, झगड़ालू, कमजोरी या छिद्र को ढूँढ़कर उस पर हंसनेवाले, लालची, जो दूसरी की उन्नति में द्वेष भाव रखते हैं, दूसरों की निन्दा ही करना जिनका काम है, चंचल प्रकृति, अस्थिर मन, दुश्मन से मिले हुए, या काम क्रोधादि के वशीभूत, दयारहित, निर्दयी, धर्म से न डरने वाले, ऐसे नीच पुरुषों को छोड़ देना चाहिये ॥५६-५७॥ सेवन करने योग्य मनुष्य— बुद्धि-विद्या-वयः-शील-धैर्य-स्मृति-समाधिभिः । वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गत-व्यथाः ॥५८॥