भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१०६ चरकसंहिता [ अ० ७ श्लेष्मा और स्वास्थ्य नष्ट हो जाते हैं और शरीर के दोष कुपित होते हैं। दही में घी मिलाने से दही कफकारक हो जाता है, परन्तु वायु का नाश करता है। शर्करा युक्त दही 'पित्त' ( जठराग्नि या पित्त को ) नहीं बढ़ाता, परन्तु आहार भोजन को पचा देता है। इस लिये तृष्णा, प्यास और कलेजे की जलन को मिटाता है। मूंग के साथ मिलाकर दही खाने से 'वातरक्त' रोग में लाभ होता है। शहद के मिलाने से दही सुस्वाद और थोड़ा दोष वाला हो जाता है। दही को गरम करके खाने से रक्तपित्त जन्य विकार नष्ट होते हैं, आंवले के साथ खाने से भी रक्त पित्त रोग शान्त होता है। बहुत दही खाने वाला मनुष्य जो इस उपरोक्त विधि को छोड़ कर दही खाता है, उसको ज्वर, रक्तपित्त, वीसर्प, कुष्ठ, पाण्डुरोग, भ्रम, और तीव्र कामला रोग हो जाते हैं ॥ ६०-६५ ॥ तत्र श्लोकाः- वेगा वेगसमुत्थाश्च रोगास्तेषां च भेषजम् । येषां वेगा विधार्याश्च यदर्थं यद्धिताहितम् ॥ ६६ ॥ उचिते चाहिते वर्ज्ये सेव्ये चानुचिते क्रमः । यथाप्रकृति चाऽऽहारो मलायनगदौषधम् ॥ ६७ ॥ भविष्यतामनुत्पत्तौ रोगाणामौषधं च यत् । वर्ज्याः सेव्याश्च पुरुषा धीमताऽऽत्म-सुखार्थिना ॥ ६८ ॥ विधिना दधि सेव्यं च येन यस्मात्तदत्रिजः । न वेगान्धारणेऽध्याये सर्वमेवाबदन्मुनिः ॥ ६६ ॥ मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले स्वाभाविक वेग, वेगों को रोकने से उत्पन्न होने वाले रोग, इन रोगों की औषध, जिन उपस्थित वेगों को धारण करना चाहिये, जिस के लिये जो लाभकारी है, उचित एवं अहितकारी, छोड़ने योग्य और सेवनीय क्रम प्रकृत के अनुसार आहार, मलस्थान मल की वृद्धि, क्षय, औषध, भविष्य में न होने वाले रोगों की औषध, सुख चाहने वाले बुद्धिमान् मनुष्य को जिन पुरुषों को छोड़ना या जिनका सेवन करना उचित है, और दही को सेवन करने की विधि यह सब आत्रेय मुनि ने 'न वेगान्धारणीय' नामक अध्याय में सम्पूर्ण रूप से उपदेश किया है ॥ ६६-६९ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने स्वस्थवृत्तचतुष्के 'न वेगान्धारणीयो' नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ और