चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 150, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ चरकसंहिता [अ० ११ भिन्नता के कारण पुनर्जन्म में सन्देह है। कुछ मनुष्य जन्म का कारण माता-पिता को मानते हैं, और कोई स्वभाव को ही जन्म का कारण मानते हैं। तीसरे दूसरे को समस्त जगत् का कारण मानते हैं। चौथे लोग 'यदृच्छा' को ही जन्म का कारण मानते हैं, अर्थात् अपने आप बिना कारण के ही जन्म हो गया है। इसलिये सन्देह होता है कि पुनर्जन्म है, वा नहीं ॥ ६ ॥ तत्र बुद्धिमानास्तिक्यबुद्धिं जह्याद्विचिकित्सां च । कस्मात् ? प्रत्यक्षं ह्यल्पम्, अनल्पमप्रत्यक्षमस्ति यदागमानुमान-युक्तिभिरुपलभ्यते । यैरेव तावदिन्द्रियैः प्रत्यक्षमुपलभ्यते, तान्येव सन्ति चाप्र- त्यक्षाणि ॥ ७ ॥ इस अवस्था में बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि 'नास्तिक्य बुद्धि' अर्थात् परलोक नहीं है इस विचार को और संशय को छोड़ दे । क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान बहुत थोड़ा है और अप्रत्यक्ष ज्ञान बहुत है जिसको आगम शास्त्र, अनुमान और युक्ति से जाना जाता है। जिन ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष ज्ञान किया जाता है वे इन्द्रियां स्वयं अप्रत्यक्ष हैं, आंख आंख को नहीं देख सकती, नाक नाक को नहीं सूंघ सकती, कान कान को नहीं सुन सकते ॥७॥ सतां च रूपाणामतिसंनिकर्षादतिविप्रकर्षादावरणात्करणदौर्बल्या- न्मनोऽनवस्थानात्समानाभिहारादभिभवादतिसौक्ष्म्याच्च प्रत्यक्षानुपल- ब्धिस्तस्मादपरीक्षितमेतदुच्यते—प्रत्यक्षमेवास्ति, नान्यदस्तीति ॥ ८ ॥ और रूप आदि के बहुत समीप होने से (जैसे पलकों में लगा हुआ काजल), अति विप्रकर्ष अर्थात् बहुत दूर होने से (जैसे बहुत दूर उड़ता हुआ पक्षी), बीच में व्यवधान आने से (जैसे दीवार के पीछे रक्खी वस्तु), इन्द्रिय के निर्बल होने से, मन स्थिर न होने से, एक साथ दो या अधिक भिन्न विषयों में इच्छा करने से, तिरस्कृत होने से यथा—मध्यान्ह में सूर्य की किरणों द्वारा तिरस्कृत नक्षत्रादि, अतिसूक्ष्म होने से, जैसे कृमि या द्वयणकादि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं होता। इसलिये जो चार्वाक आदि नास्तिक का यह कहना कि 'प्रत्यक्ष' इन्द्रियों से जिसका ज्ञान होता है वही है, उसके अतिरिक्त और नहीं है वह अपरीक्षित अर्थात् बिना सोचे विचारे कहा गया है ॥८॥ श्रुतयश्चैता न कारणं, युक्तिविरोधात् ॥ ९ ॥ नाना वादिजनों के वचन भी परलोक के न होने में प्रमाण नहीं हैं क्योंकि वे युक्ति (तर्क) से विरुद्ध हैं ॥९॥ युक्ति— आत्मा मातुः पितुर्वा यः सोऽपत्यं यदि संचरेत् । द्विविधं संचरेदात्मा सर्वो वाऽवयवेन वा ॥ १० ॥