भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

१३६ चरकसंहिता [ अ० ११ पानी, कर्षण ( हल चलाया हुआ खेत ), बीज और ऋतु इन चारों के संयोग से अन्न उत्पन्न होता है। उत्तम क्षेत्र में समय पर उत्तम बीज पानी से सींचकर बोने से अनाज होता है। इसलिये पृथ्‍वी, अप्, तेज, वायु और आकाश एवं चेतना इन छः के संयोग से गर्भ का होना सम्भव है; यह युक्ति है। इसी प्रकार 'मन्थ्य' अरणी का अधः काष्ठ (नीचे की लकड़ी), मन्थन ( मथने का डण्डा ) और ( मन्थान ) मथनी चलाने वाला कर्ता, इन तीनों के संयोग से अग्नि उत्पन्न होना सम्भव है। इसी प्रकार चतुष्पाद ( चिकित्सा के चारों अङ्ग की ) युक्ति से युक्त सम्पत् रोग को नाश करने वाली है। यदि चिकित्सा के चारों अंग ठीक तरह से प्रयुक्त किये जायें, तो रोग मिटना सम्भव है ॥ २४-२५ ॥ बुद्धिः पश्यति या भावान् बहु-कारण-योगजान् । युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ २६ ॥ एषा परीक्षा नास्त्यन्या यया सर्वं परीक्ष्यते । परीक्ष्यं सदसच्चैव तया चास्ति पुनर्भवः ॥ २७ ॥ जो बुद्धि बहुत प्रकार के कारणों से उत्पन्न पदार्थों को ज्ञान के लिए देखती है उस बुद्धि को 'युक्ति' कहते हैं। यह दृष्टि तीनों कालों के विषय को देखती है, इस युक्ति से त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। यह चार प्रकार की ( आप्तोपदेश, प्रत्यक्ष, अनुमान और युक्ति ) परीक्षा है, इसमे भिन्न और परीक्षा नहीं है। इस चार प्रकार की परीक्षा से सब कुछ सत्, असत्, भाव, अभाव जो कुछ ज्ञेय है, वह सब जाना जाता है। सत् असत् की परीक्षा करके ही जाना गया है कि पुनर्भव होता है ॥ २६-२७ ॥ तत्राऽऽप्तागमस्तावद्वेदः, यश्चान्योऽपि कश्चिद्वेदादर्थादविपरीततः परी- क्षकैः प्रणीतः शिष्टानुमतो लोकानुग्रह-प्रवृत्तः शास्त्र-वादः स चाऽऽप्तागमः । आप्तागमादुपलभ्यते-दान-तपो-यज्ञ-सत्याहिंसा-ब्रह्मचर्याण्यभ्युदय-निः- श्रेयस-कराणीति । न चानिवृत्त-सत्त्व-दोषाणामदोषैर पुनर्भवो धर्मद्वारेषू- पदिश्यते । धर्मद्वारावहितैश्च व्यपगत-भय-राग-द्वेष-लोभ-मोह-मानैर्ब्रह्म- परैराप्तैः कर्मविद्भिरनुपहत-सत्त्व-बुद्धि-प्रचारैः पूर्वैः पूर्वतरैर्महर्षिभिर्दिव्य- चक्षुभिर्दृष्टोपदिष्टः पुनर्भव इति व्यवस्येदेवम् ॥ २८ ॥ आप्त पुरुषों का आगम वेद ( ऋग्, यजुः, साम और अथर्व ) हैं। वेदों के सिवाय और भी कोई अन्य जो कि वेद के अर्थ के अनुकूल, परीक्ष- से बनाया हुआ शिष्ट पुरुषों से अनुमत, जनसमाज के कल्याण के लिये प्रवृ-