चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ११ ] सूत्रस्थानम् १४१ मात्रा में उपयोग रसनेन्द्रिय का 'अतियोग' है, सर्वथा रसों का न खाना अयोग है। आगे विमान स्थान (अ० १) में कहे हुए प्रकृति, करण, संयोग, देश, काल, उपयोग, संस्थोपयोक्तृ और राशि इन आठ में से राशि को छोड़कर शेष सात के विरुद्ध आहार करने का नाम रसनेन्द्रिय का 'मिथ्यायोग' है। बहुत ठण्डे बहुत गरम स्पर्श, बहुत अधिक स्नान, बहुत मालिश, बहुत उबटन लगाना, त्वक्-इन्द्रिय का 'अतियोग' है। इनके बिल्कुल सेवन न करना 'अयोग' है, ऊंचे नीचे स्थान का, चोट घाव आदि और शव आदि अपवित्र वस्तुओं का स्पर्श करना 'मिथ्यायोग' है ॥ ३६ ॥ तत्रैकं स्पर्शनमिन्द्रियमिन्द्रियाणा मिन्द्रियव्यापकं चेतः, समवायि स्प- र्शनेनव्याप्तेर्व्यापकमपि च चेतः, तस्मात्सर्वेन्द्रियाणां व्यापकस्पर्शकृतो यो भावविशेषः सोऽयमनुपशयात्तञ्चत्रिधस्त्रिविधविकल्पो भवत्यसात्म्येन्द्रि- यार्थसंयोगः; सात्म्यार्थो ह्युपशयार्थः ॥ ३७ ॥ इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से एक स्पर्शन (त्वचा) इन्द्रिय शेष घ्राण, रसना, चक्षु और कर्ण इन चार इन्द्रियों में और गुदा, लिंग, हाथ, पैर और वाणी में भी व्यापक हैं और वह त्वग्-इन्द्रिय मन के साथ समवाय सम्बन्ध से संयुक्त है, इसलिये त्वग् इन्द्रिय सब इन्द्रियों में फैली होने से और चित्त का इस त्वगिन्द्रिय के साथ समवाय सम्बन्ध होने से मन भी व्यापक हो जाता है। इसलिये सब इन्द्रियों में व्यापक स्पर्शनेन्द्रिय के साथ समवाय सम्बन्ध से जुड़ा हुआ मन, आत्मा के अभीप्सित विषय को ग्रहण करने के लिये स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा प्राप्त मार्ग से, उस विषय को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय तक पहुंच जाता है। इस से सब इन्द्रियों में व्यापक त्वक् के स्पर्श से उत्पन्न जो अपने अपने विषय के ज्ञान विशेष उत्पन्न होते हैं, वे शरीर के अनुकूल न होने पर, पांच प्रकार के होने पर भी तीन प्रकार होते हैं । यथा ( १ ) 'असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग' अर्थात् इन्द्रियों का विषय के साथ अनुचित रूप से संयोग होना अतियोग, अयोग और मिथ्या- योग इन तीन प्रकार का हो जाता है। सात्म्य का अर्थ उपशय है, शरीर के जो अनुकूल पड़े वह 'सात्म्य' है ॥ ३७ ॥ कर्म वाङ्-मनः-शरीर-प्रवृत्तिः । तत्र वाङ्मनःशरीरातिप्रवृत्तिरति- योगः, सर्वशोऽप्रवृत्तिरयोगः, वेग-धारणोदीरण-विषम-स्खलन-गमन-प- तन-अङ्ग-प्रणिधानाङ्ग-प्रदूषण-प्रहार-मर्दन-प्राणोपरोध-संक्लेशानादिः शा- रीरो मिथ्यायोगः । सूचकानृताकाल-कलहाप्रियाबद्धानुपचार-परुष-बच-