भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१४६ चरकसंहिता [ अ० ११ प्रयोग-ज्ञान-विज्ञान-सिद्धि-सिद्धाः सुखप्रदाः । जीविताभिसरा ये स्युर्वैद्यत्वं तेष्ववस्थितम् ॥ ५४ ॥ सद्‌वैद्य का लक्षण—औषध का, प्रयोग और शास्त्र का ज्ञान, लोक व्यव- हार के जानने, प्रख्यात एवं रोगियों को सुखी करने वाले 'प्राणाभिसर' कहाते हैं । इन्हीं पुरुषों में वैद्य का लक्षण विद्यमान है। उन्हीं को वैद्य कहना चाहिये ॥ त्रिविधमौषधमिति दैवव्यपाश्रयम्, युक्तिव्यपाश्रयम्, सत्त्वावज- यश्च । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधि-मणि-मङ्गल-बल्युपहार-होम-नि- यम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन-प्रणिपात-तीर्थगमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं पुनराहारौषधद्रव्याणां योजना । सत्त्वावजयः पुनरहितेभ्योऽर्थेभ्यो मनो- विनिग्रहः ॥ ५५ ॥ औषध तीन प्रकार की है—दैवव्यपाश्रय, युक्तिव्यपाश्रय और सत्त्वावजय । इनमें दैव-व्यपाश्रय देव अर्थात् ईश्वर पर आश्रित औषध, मन्त्र, ओषधि, मणि, मंगल, शुभ कर्म्म, नियम, प्रायश्चित्त, उपवास, स्वस्तिपाठ, नमस्कार तीर्थाटन आदि हैं । युक्ति अर्थात् योग पर आश्रित औषध आहार एवं औषध द्रव्यों- दोष नाशक पदार्थों की योजना । सत्त्वावजय—मन, को अहितकारक विषयों से रोकना तीसरी प्रकार की औषध है ॥ ५५ ॥ शारीर-दोष प्रकोपे तु खलु शरीरमेवाऽऽश्रित्य प्रायस्त्रिविधमौषध- मिच्छन्ति—अन्तःपरिमार्जनम्, बहिःपरिमार्जनम्, शस्त्रप्रणिधानं चेति । तत्रान्तःपरिमार्जनं यदन्तःशरीरमनुप्रविश्यौषधमाहार-जात-व्याधीन् प्र- मार्ष्टि । यत्पुनर्बहिःस्पर्शमाश्रित्याभ्यङ्ग-स्वेद-प्रदेह-परिषेकोन्मर्दनाद्यैरा- मयान् प्रमाष्टि तद्बहिःपरिमार्जनम् । शस्त्रप्रणिधानं पुनश्छेदन-भेदन-व्यध- न-दारण-लेखनोत्पाटन-प्रच्छन-सीवनैषण-क्षार-जलौकसश्चेति ॥ ५६ ॥ शरीर के वात, पित्त, कफ इन दोषों के कुपित होने पर शरीर को ही आश्रय करके तीन प्रकार की औषधों का विशेष रूप से व्यवहार करते हैं । जैसे अन्तःपरिमार्जन, बहिःपरिमार्जन और शस्त्र-प्रणिधान । इनमें जो औषध या आहार शरीर के अन्दर घुसकर उत्पन्न हुए रोगों को शान्त करता है वह 'अन्तःपरिमार्जन' है और जो शरीर के बाहर ही त्वचा पर अभ्यंग, स्वेद, प्रलेप, परिषेक, उन्मर्दन ( मालिश ) आदि द्वारा रोगों को शान्त करता है, उसे 'बहिः परिमार्जन' कहते हैं । छेदन ( दो करना ) भेदन ( आशय के अन्दर घुसना व्यधन ( आशयों से भिन्न स्थान में भेदन करना ), दारण ( चीरना ), लेखन ( खुरचना ), उत्पाटन ( उखाड़ना ), प्रच्छन ( शस्त्र आदि से फाड़ना,