चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४८ चरकसंहिता [ अ० १२ रस्सी से बँधी गोह बलवान पुरुष द्वारा खींचने पर मर जाती है—ऐसे ही वह भी मर जाता है । इसलिये जो व्यक्ति सुख चाहे वह रोगों के उत्पन्न होने से पूर्व, ( संचयावस्था में, रोगों की तरुणदशा में ) ही दोषों का औषधियों से प्रतीकार करे ॥ ५७ ६४ ॥ तत्र श्लोकौ । एषणाश्चाप्युपस्तम्भा बलं कारणमामयाः । तिस्रैषणीये मार्गाश्च भिषजो भेषजानि च ॥ ६५ ॥ त्रित्वेनाष्टौ समुद्दिष्टाः कृष्णात्रेयेण धीमता । भावा भावेष्वसक्तेन येषु सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ६६ ॥ इति । - तिस्रैषणीय अध्याय में बुद्धिमान् ऋषि कृष्णात्रेयने तीन एषणायें, उपस्तम्भ, बल, रोगों के कारण, रोगमार्ग, वैद्य, भेषज्य, औषध, इन आठों के तीन तीन भेद कर कल्पना सहित उपदेश किये हैं ॥ ६५-६६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के तिस्रैषणीयो नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः । अथातो वातकलाकलीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे 'वातकलाकलीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ वातकलाकलज्ञानमधिकृत्य परस्परमतानि जिज्ञासमानाः समु- पविश्य महर्षयः पप्रच्छुरन्योन्यं किंगुणो वायुः, किमस्य प्रकोपनम्, उपशमनानि वाऽस्य कानि, कथं चैनमसंघातवन्तमनवस्थितमनासाद्य प्रकोपनप्रशमनानि प्रकोपयन्ति प्रशमयन्ति वा, कानि चास्य कुपिता- कुपितस्य शरीराशरीरचरस्य शरीरेषु चरतः कर्माणि बहिःशरीरेभ्यो वेति ॥ ३ ॥ वायु के अंगांश विकल्पना के सम्बन्ध में महर्षि लोग एकत्र होकर परस्पर एक दूसरे के मत जानने के लिये पूछने लगे कि—वायु के क्या गुण हैं ? वायु को प्रकुपित करने वाले कौन से कारण हैं ? कुपित वायु को शान्त करने