भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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१५६ चरकसंहिता [ अ० १३ सांख्यैः संख्यातसंख्येयैः सहाऽऽसीनं पुनर्वसुम् । जगद्धितार्थं पप्रच्छ वह्निवेशः स्वसंशयम् ॥ ३ ॥ जिन तत्त्वज्ञानी लोगों ने जानने योग्य बातों को भली प्रकार जान लिया था ऐसे मुनियों के साथ बैठे हुए पुनर्वसु आत्रेय से, ऋषि अग्निवेश ने अपने सन्देह को जगत् के कल्याण के लिये पूछा ॥ ३ ॥ कियोनयः, कति स्नेहाः, के च स्नेहगुणाः पृथक् । कालानुपानं के, कस्य, कति, काश्च विचारणाः ॥ ४ ॥ कति मात्राः कथंमाना; का च केषूपदिश्यते । कश्च केभ्यो हितः स्नेहः, प्रकर्षः स्नेहने च कः ॥ ५ ॥ स्नेह्याः के, के न च स्निग्धाः, स्निग्धातिस्निग्धलक्षणम् । किं पानात्प्रथमं, पीते जीर्णे किं च हिताहितम् ॥ ६ ॥ के मृदु-क्रूर-कोष्ठाः, का व्यापदः, सिद्धयश्च काः । अच्छे संशोधने चैव स्नेहे का वृत्तिरिष्यते ॥ ७ ॥ विचारणाः केषु योज्या विधिना केन तत् प्रभो ! । स्नेहस्यामितविज्ञान ! शाखमिच्छामि वेदितुम् ॥ ८ ॥ स्नेहों के उत्पत्ति स्थान कौन से हैं ! स्नेह कितने हैं ! पृथक् पृथक् प्रत्येक स्नेह के गुण क्या हैं ! प्रत्येक स्नेह का समय, अनुपान क्या है ? विचारणाएं कितने प्रकार की हैं ! मात्रायें कितनी हैं ! उनका परिमाण क्या है ? और कौन सा परिमाण किसके लिये कहा गया है ? कौनसा स्नेह किस के लिये हितकारी है ! स्नेहन में कौन से स्नेह उत्तम हैं ! स्नेह के योग्य कौन हैं ! स्नेह के अयोग्य कौन हैं ? अस्निग्ध और अतिस्निग्ध के लक्षण क्या हैं ? स्नेहपान से पूर्वं क्या पीना और क्या नहीं पीना चाहिये ? स्नेह के जीर्ण होने पर क्या पीना हितकारी और क्या अहितकारी है ? मृदु, क्रूर, कोष्ठ वाले कौन हैं ? स्नेह से कौन से रोग उत्पन्न होते हैं ? उनका उपचार क्या है ? संशमन, संशोधन और स्नेहन में कैसे बर्ताव से रहें ? किन २ पुरुषों में विचारणा किस विधि से प्रयोग करनी चाहिये ? हे प्रभो ! स्नेह सम्बन्धी अनन्त ज्ञान को जानने की मेरी इच्छा है ॥ ४-८ ॥ अथ तत्संशयच्छेत्ता प्रत्युवाच पुनर्वसुः । स्नेहानां द्विविधा सौम्य ! योनिः स्थावर-जङ्गमा ॥ ९ ॥ तिलः प्रियालाभिषुकौ बिभीतकश्चित्राभयरण्ड-मधूक-सर्षपाः । कुसुम्भ-बिल्वारुक-मूलकातसी-निकोतकाक्षोड-करञ्ज-शिग्रुकाः ॥ १० ॥