चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ चरकसंहिता [ अ० १३ भाले आदि से बिंधने चोट लगाकर अस्थि आदि के टूटने चोट लगने, योनि की भ्रंशता ( गर्भाशय आदि अंगों की स्थान च्युति ), कर्ण रोग, शिरो रोग, पुरुषत्व बढ़ाने, शरीर को चिकना करने और व्यायाम अर्थात् शारीरिक श्रम में वसा ( चर्बी ) हितकारी है ॥ १६ ॥ बल-शुक्र-रस-श्लेष्म-मेदो मज्ज-विवर्धनः । मज्जा विशेषतोऽस्थ्नां च बलकृत्स्नेहने हितः ॥ १७ ॥ बल, शुक्र, रस, कफ, मेद और मज्जा को बढ़ाती है । विशेषकर अस्थियों की शक्ति बढ़ाती एवं शरीर को चिकना बनाने में विशेष रूप से हितकारी है ॥ १७ ॥ सर्पिः शरदि पातव्यं, वसा मज्जा च माधवे । तैलं प्रावृषि, नात्युष्णशीते स्नेहं पिबेन्नरः ॥ १८ ॥ वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः । श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ॥ १९ ॥ घी शरद् ऋतु ( आश्विन-कार्तिक ) में, चर्बी और मज्जा वसन्त ऋतु ( फाल्गुन-चैत्र ) में और तैल वर्षाकाल (श्रावण-भाद्रपद ) में सेवन करना चाहिये । अति उष्ण काल (ग्रीष्म ) अथवा आते शीतकाल ( हेमन्त ) में स्नेह नहीं पीना चाहिये । तीव्र व्याधि में, ग्रीष्म ऋतु में, रात्रि के समय; वात और पित्त की अधिकता होने पर स्नेह पी लेना चाहिये । कफप्रधान व्याधि में शीतकाल के अन्दर (हेमन्त-शिशिर ऋतु में ) मध्याह्न समय में दिन के समय स्नेहपान करना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ अत्युष्णे वा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा । मूर्च्छां पिपासामुन्मादं कामलां वा समीरयेत् ॥ २० ॥ शीते रात्रौ पिबेत्स्नेहं नरः श्लेष्माधिकोऽपि वा । आनाहमरुचिं शूलं पाण्डुतां वा समृच्छति ॥ २१ ॥ जलमुष्णं घृते पेयं, यूषम्तैलेऽनुशस्यते । वशामज्ज्ञोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा ॥ २२ ॥ वातप्रधान या पित्तप्रधान रोगी ग्रीष्म ऋतु में या दिन के समय यदि स्नेहपान करता है तो मूर्छा, प्यास, उन्माद अथवा कामला रोग उत्पन्न हो जाते हैं । कफप्रधान रोगी यदि शीत ऋतु में या रात्रि के समय स्नेहपान करता है तो उसे अफरा, अरुचि, शूल-पीड़ा या पाण्डुरोग उत्पन्न हो जाता है । घी पीने के उपरान्त गरम जल, तैल के उपरान्त यूष और वसा एवं मज्जा के