भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

१६० चरकसंहिता [ अ० १३ ओकत्तू-व्याधि-पुरुषान् प्रयोज्या जानता भवेत् ॥ २७ ॥ छः रसों ( मधुर अम्ल, लवण, तिक्त, कटु और कषाय ) के परस्पर मिलने से ६३ प्रकार के भेद हो जाते हैं । इन तिरसठ भेदों के साथ जब स्नेह मिलता है, तो वह भी ६३ प्रकार का हो जाता है और जब किसी भी रस के साथ न मिलकर शुद्ध स्नेह रूप में ही रहता है, तब एक भेद होता है । इस एक प्रकार को भी मिलाकर स्नेह के ६४ प्रकार हो जाते हैं । इस प्रकार से स्नेह की विचारणा अर्थात् सेवन विधि ६४ ( चौंसठ ) प्रकार की है । ( ओक ) सात्म्य, ऋतु और रोग-बल आदि का विचार करके सेवन विधि का प्रयोग करना चाहिये ॥ २७-२८ ॥ स्नेह की मात्रा— अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते । प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति ॥ २९ ॥ इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्रा स्नेहस्य मानतः । तासां प्रयोगान्वक्ष्यामि पुरुषं पुरुषं प्रति ॥ ३० ॥ स्नेह की मात्रा तीन प्रकार की है । प्रधान, मध्यम और ह्रस्व । इनमें जो स्नेह की मात्रा रात और दिन ( २४ घण्टे ) में जीर्ण होती है, वह स्नेह की प्रधान मात्रा है और जो सारे दिन भर ( १२ घण्टे ) में जीर्ण होती है वह मध्यम, और जो आधे दिन ( ६ घण्टे ) में जीर्ण होती है वह स्नेह की ह्रस्व मात्रा है । ये मात्राएं स्नेह के जीर्ण होने के समय के अनुसार हैं । इस प्रकार से स्नेह की मात्रा और मान कह दिया है ॥ २९-३० ॥ अब प्रत्येक पुरुष के लिये स्नेह के प्रयोगों को कहते हैं— प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासासहा नराः । पावकश्चोत्तमो येषां ये चोत्तमा बले ॥ ३१ ॥ गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च विसर्पोपहताश्च ये । उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च ॥ ३२ ॥ पिबेयुरुत्तमां मात्रां, तस्याः पाने गुणान् शृणु । विकारान् शमयत्येषा शीघ्रं सम्यक्प्रयोजिता ॥ ३३ ॥ दोषानुहर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी । बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ॥ ३४ ॥ “तक्रे कपित्थ चाङ्गेरीमरिचाजाजिचित्रकैः । सूपः खण्डयूषोऽयं काम्बलिको मतः ॥ दध्यम्लो लवण-स्नेह-तिलमाषान्वितः शृतः ॥”