भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

१६६ चरकसंहिता [ अ० १३ मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया । स्निह्यति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ॥ ६५ ॥ मृदुकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का अच्छपान करके तीन रात्रि तक सेवन करने पर स्निग्ध हो जाता है। क्रूरकोष्ठ वाला व्यक्ति स्नेह का सात दिन अच्छपान करके स्निग्ध होता है ॥ ६५ ॥ गुडमिक्षुरसं मस्तु क्षीरमुल्लाडितं दधि । पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्य-त्रिफला-रसम् ॥ ६६ ॥ द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा । मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते ॥ ६७ ॥ गुड़, गन्ने का रस, मस्तु (दही का द्रव्य भाग), दूध, बिलोई हुई दही (मट्ठा), खीर, खिचड़ी, घी, गम्भारो का रस, त्रिफला (हरड़, बहेड़े, आंवले का रस), अंगूर का रस, पीलू का रस, गरम जल, नवीन मदिरा (पुरानी नहीं), इनको पीने से मृदुकोष्ठ, व्यक्तियों को विरेचन हो जाता है। अर्थात् जिनको इन वस्तुओं के सेवन से विरेचन हो जाय, वह मृदुकोष्ठ होता है।६६-६७। विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन । भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहणीयत्युल्बणानिला ॥ ६८ ॥ इन पदार्थों से 'क्रूरकोष्ठ' वाले व्यक्ति को कभी विरेचन नहीं होता। क्योंकि 'क्रूरकोष्ठ' व्यक्ति की ग्रहणी (नाड़ी) अति प्रबल वायुवाली होती है ॥ ६८ ॥ उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता । मृदुकोष्ठस्य तस्मात्स सुविरेच्यो नरः स्मृतः ॥ ६९ ॥ मृदुकोष्ठ की ग्रहणी और पित्त प्रवल एवं मन्दकफ तथा अल्पवायु युक्त है। इसलिये गुड़ आदि से उसे विरेचन हो जाता है ॥ ६९ ॥ स्नेह की व्यापत्तियां— उदीर्णपित्ता ग्रहणी यस्य चाग्निवलं महत् । भस्मीभवति तस्याऽऽशु स्नेहः पीतोऽग्नितेजसा ॥ ७० ॥ स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली । स्नेहाग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्गामुदीरयेत् ॥ ७१ ॥ नालं स्नेहसमुद्भूत्य शमायान्नं सुगुर्वपि । स चेत्सुशीतं सलिलं नाऽऽसादयति दह्यते ॥ ७२ ॥ यथैवाऽऽशीविषः कक्षमध्यगः स्वविषाग्निना ।