चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६६ गव्या जौरभ्र मात्स्याश्च रसाः स्युः स्नेहने हिताः । यव-कोल-कुलत्थाश्च स्नेहाः सगुडशर्कराः ॥ ८४ ॥ दाडिमं दधि सव्योषं रस-संयोग-संग्रहः । जो मनुष्य स्नेह से द्वेष करते हों, जो नित्य प्रति स्नेह का व्यवहार करते हों, मृदुकोष्ठ वाले, कष्ट को सहन न करने वाले, जो नित्य मदिरासेवी हों, उनमें विचारणा का प्रयोग करना चाहिये । प्रयोग करने की विधि कहते हैं— बटेर, मोर, हंस, सुअर, मुर्गा, हाथी, बकरा, मेंढा और मछली इनके मांसों का रस स्नेहन क्रिया में हितकारा है । इन मांसों का संस्कार करने के लिये जौ, बेर, कुलथी, घी या तेल, गुड़, शक्कर अनारदाना, दही, सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली, ये यथायोग्य मिलाने चाहियें ॥ ८२-८४ ॥ स्नेहयन्ति तिलाः पूर्वं जग्धाः सस्नेहफाणिताः ॥ ८५ ॥ कृशराश्च बहुस्नेहास्तिलकाम्बलिकस्तथा । घी में (स्नेह में) भून कर बनाये हुए तिलकुट को भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन करते हैं । इसी प्रकार बहुत स्नेह वाली खिचड़ी तथा तिल युक्त 'काम्बलिक अर्थात् यूष'—भोजन से पूर्व खाने से शरीर का स्नेहन करते हैं ॥ ८५ ॥ फाणितं शृङ्गवेरं च तैलं च सुरया सह ॥ ८६ ॥ पिवेदूक्षो भृतैर्मासैर्जीर्णेऽश्नीयाच्च भोजनम् । फाणित (आधा पका गन्ने का रस, राब), अदरख, और तैल इन तीनों को एक करके, शराब में मिलाकर रूक्ष व्यक्ति पीये । इसके जीर्ण होने पर भुने हुए मांस से भोजन खाये ॥ ८६ ॥ तैलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा ॥ ८७ ॥ पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः । वातप्रकृति का मनुष्य मद्य, या मण्ड के साथ तैल, वसा या मज्जा को मिलाकर पीये तो स्नेहन होता है । वात प्रकृति का आदमी राब के साथ दूध को पीये तो भी स्नेहन होता है ॥ ८७ ॥ धारोष्णं स्नेहसंयुक्तं पीत्वा सशर्करं पयः ॥ ८८ ॥ नरः स्निह्यति पीत्वा वा सरं दध्नः सफाणितम् । धारोष्ण, ताजे दुहे हुए दूध को शर्करा एवं घी के साथ पीने से शरीर का तुरन्त स्नेहन होता है । अथवा राब के साथ दही की मलाई खाने से भी स्नेहन तुरन्त होता है ॥ ८८ ॥