चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंओ३म् चरकसंहिता सूत्रस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ अब यहां से 'दीर्घ-जीवतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं ॥ १ ॥ इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था १ ॥ २ ॥ ऋषि भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन दीर्घं जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज उपागमत् । इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥३॥ दीर्घ काल तक जीवन की इच्छा से उग्रतपस्वी भरद्वाज मुनि देवों के राजा इन्द्र को शरण योग्य जानकर उनके पास गये ॥ ३ ॥ १. निष्प्रयोजन और अभिधेयरहित अर्थ में बुद्धिमानों की प्रवृत्ति नहीं होती ! इसलिये सब से प्रथम शास्त्र का प्रयोजन अभिधेय और सम्बन्ध बतलाना चाहिये । कहा भी है— अभिधेयफलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः । श्रोतुमल्पमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥ सिद्धार्थे सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते । शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥ इस शास्त्र का प्रयोजन 'धातुसाम्य' है । कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्यप्रयोजनम्' 'धातुसाम्य' का अर्थ विषम हुए धातुओं को समान करना और समान धातुओं का रक्षण करना है। अथवा रोगी के रोग का निवारण करना और स्वस्थ