चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header] अ० १५] सूत्रस्थानम् १०५
स्विन्नातिस्विन्नरूपाणि तथाऽतिस्विन्नभेषजम् । अस्वेद्याः स्वेदयोग्याश्च स्वेदद्रव्याणि कल्पना ॥ ६९ ॥ त्रयोदशविधः स्वेदो विना दशविधोऽग्निना । संग्रहेण च षट् स्वेदाः स्वेदाध्याये निदर्शिताः ॥ ७० ॥ स्वेदाधिकारे यद्वाच्यमुक्तमेतन्महर्षिणा । शिष्यैस्तु प्रतिपत्तव्यमुपदेष्टा पुनर्वसुः ॥ ७१ ॥ इति । किस प्रकार से स्वेद कार्य कर सकता है, किनके लिये उपकारी है, किस प्रकार, किस स्थान पर, कैसा स्थान, किस प्रकार रक्षा करनी, सम्यक् स्विन्न, अतिस्वेद के लक्षण, अतिस्वेद की चिकित्सा, स्वेद के अयोग्य और स्वेद के योग्य, स्वेदन द्रव्य, तेरह प्रकार का स्वेद और बिना अग्नि के दस प्रकार का स्वेद, संक्षेप रूप में छः स्वेद—ये सब स्वेदाध्याय में कह दिया । स्वेद अधि- कार में जो कुछ कहना चाहिये था वह सब महर्षि ने कह दिया है । शिष्यों को ठीक २ प्रकार समझना चाहिये, इसके उपदेश करने वाले पुनर्वसु आत्रेय हैं॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने कल्पनाचतुष्के स्वेदाध्यायो नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
पञ्चदशोऽध्यायः ।
अथात उपकल्पनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब उपकल्पनीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥२॥ इह खलु राजानं राजमात्रं वाऽन्यं विपुलद्रव्यं संभृतसंभारं वमनं विरेचनं वा पाययितुकामेन भिषजा प्रागेवौषधपानात्संभारा उपकल्प- नीया भवन्ति, सम्यक्चैव हि गच्छत्यौषधे प्रतिभोगार्थाः, व्यापन्ने चौषधे व्यापदः परिसंख्याय प्रतीकारार्थाः । न हि संनिकृष्टे काले प्रादुर्भू- तायामापदि सत्यपि क्रयाक्रये सुकरमाशु संभरणमौषधानां यथा- वदिति ॥ ३ ॥ इस लोक में राजा अथवा राजा के समान ठाठ वाले पुरुष को या बहुत धन और नौकर चाकरों वाले किसी रईस को वमन, विरेचन देने की इच्छा करने