चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 221, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०३ गुर्वम्ल-हरितदानादतिशीताम्बु-सेवनात् । शिरोभितापाद् दुष्टामाद्रोदनाद् बाष्पनिग्रहात् ॥ १० ॥ मेघागमान्मनस्तापाद्देशकाल-विपर्ययात् । वातादयः प्रकुप्यन्ति शिरस्यस्रं च दुष्यति ॥ ११ ॥ ततः शिरसि जायन्ते रोगा विविधलक्षणाः । अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु महाराज बोले—हे सौम्य ! जो कुछ तुमने पूछा है उसको ध्यान देकर सविस्तर सुनो । शिर के रोग पांच प्रकार के हैं, और पांच ही प्रकार के हृदय रोग हैं। दोषों के वात-पित्त-कफ के परिमाण से होने वाले रोग बासठ (६२) प्रकार के हैं । क्षय अठारह (१८) प्रकार के, प्रमेह मधुमेह के कारण होने वाले फोड़े सात प्रकार के, और दोषों की गति तीन प्रकार की है । इसी को अब विस्तार से सुनो । मूत्र आदि के उपस्थित वेगों को रोकने से, दिन में सोने से, रात्रि में जागने से, नशा करने ( मदकारक पदार्थों के सेवन ) से, ऊँचे या अधिक बोलने से, ओस से, सामने की वायु के झोंके से, अति स्त्री-संभोग से,असात्म्य अर्थात् प्रतिकूल, गंध के सूंघने से, धूल धुवां बर्फ या धूप के सेवन से, गरिष्ठ,खट्टे; धनिया-मरिच आदिके अधिक खाने से बहुत ठण्डे पानी के सेवन से, शिर पर चोट लगने से, आम के दोष युक्त होने से ( अजीर्ण होने से ), रोने से, आंसुओं को रोकने से, बादलों के आने से, मानसिक विक्षोभ से, देश-काल के बदलने से ( इन के अयोग, अतियोग या मिथ्यायोग होने से ), ( अथवा भूकम्प, उल्कापात आदि देश के मिथ्यायोग हैं इनसे वात, पित्त और कफ दूषित होकर शिर में रक्त को दूषित करते हैं । रक्त के दूषित होने से आगे कहे जाने वाले नानाप्रकार के लक्षणों वाले रोग शिर में उत्पन्न होते हैं ॥५-११॥ प्राणाः प्राणभृतां यत्र श्रिताः सर्वेन्द्रियाणि च ॥ १२ ॥ यदुत्तमाङ्गमङ्गानां शिरस्तदभिधीयते । प्राणधारियों के प्राण ( जीवन ) और सब इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) जहां पर स्थित हैं और जो शरीर के सब अंगों में मुख्य, श्रेष्ठ अंग है, उसको 'शिर' कहते हैं ॥१२॥ अर्धावभेदको वा स्यात्सवं वा रुज्यते शिरः ॥ १३ ॥ प्रतिश्या-मुख-नासाक्षि-कर्ण-रोग-शिरो-भ्रमाः । अर्दितं शिरसः कम्पो गलमन्या-हनुग्रहः ॥ १४ ॥ विविधाश्चापरे रोगा वातादि-क्रिमि-संभवाः ।