भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०७ ( १ ) शोक, उपवास, व्यायाम ( परिश्रम ), रूक्ष, शुष्क, और स्वल्प भोजनों से कुपित होकर वायु हृदय में जाकर इसको दूषित करके तीव्र वेदना को उत्पन्न करती है। इससे कम्पन, ऐंठन के समान वेदना, जड़ता, मूर्च्छा, शून्यता ( ज्ञान का अभाव ), चक्कर आना आदि लक्षण वातजन्य हृदय वेदना में होते हैं। भोजन के जीर्ण होनेपर ये लक्षण बहुत बढ़ जाते हैं। ( २ ) पित्त- जन्य हृदय शूल—गरम, खट्टे, नमकीन, क्षार, कटु रस के अधिक सेवन से, अजीर्णावस्था में भोजन करने से, मद्यपान से, क्रोध या धूप में बैठने या चलने से, पित्त हृदय में पहुंचकर जल्दी ही कुपित हो जाता है, कुपित होकर तीव्र वेदना उत्पन्न करता है। इस कारण हृदय में जलन, मुख में कडुआपन, खट्टे, पित्तयुक्त डकार का आना, बिना परिश्रम के थकान, प्यास, मूर्च्छा, चक्कर आना, पसीना आना ये पित्तजन्य हृदयशूल के लक्षण हैं। ( ३ ) कफजन्य हृदयशूल—बहुत परिणाम में भोजन करने से, भारी, स्निग्ध पदार्थों के सेवन से, चिन्ता न करने या थोड़ी करने, शारीरिक चेष्टाओं के कम करने से, दिन में बेफिकरी से सोने और अधिक सोने से कफ कुपित होकर हृदय में जाकर रस को दूषित करके हृदयशूल उत्पन्न करता है। इसके कारण हृदय सोया हुआ, सुस्त, गीले वस्त्र से ढंपा हुआ सा, भारी प्रतीत होता है और आलस्य, अरुचि उत्पन्न होती है और ऐसा मालूम होता है कि किसी ने हृदय पर पत्थर रख दिया हो। ( ४ ) त्रिदोषजन्य हृदय शूल—तीनों दोषों के मिलने से, तीनों दोषों के लक्षण उत्पन्न होते हैं, उसको त्रिदोषजन्य हृदयशूल कहते हैं। ( ५ ) कृमि जन्य—त्रिदोषजन्य हृदयरोग में जो दुरात्मा तिल, दूध, गुड़ ( अजीर्णावस्था में भोजन, सड़ा हुआ भोजन, विरुद्ध भोजन आदि ) सेवन करता है, उसके हृदय के एक भाग में ग्रन्थि ( गांठ ) उत्पन्न हो जाती है तथा रस का संक्लिन्न- भाग सड़ने लगता है। रस के संक्लेदन से कृमि उत्पन्न हो जाते हैं। ये कृमि हृदय के एक भाग में उत्पन्न होकर अन्य स्थान में फैलने लगते हैं और हृदय को खाने लगते हैं। इस अवस्था में रोगी को ऐसी वेदना होती है मानो कोई उसके हृदय में सुईयां चुभा रहा है। शस्त्रों से कोई हृदय को काटता है, हृदय में बहुत खाज एवं पीड़ा उठती है। इन लक्षणों को देखकर कृमिजन्य भयानक हृदय रोग को समझकर विद्वान् शीघ्र मृत्यु करने वाले रोग को शान्त करने का यत्न करे ॥३०-४०॥ द्वयुल्बणैकोल्बणैः षट् स्युर्हीनमध्याधिकैश्च षट् । समैश्चैको विकारास्ते सन्निपातास्त्रयोदश ॥ ४१ ॥ संसर्गे नव षट् तेभ्य एकवृद्धया समैस्त्रयः ।