भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 228

२१० चरकसंहिता [ अ० १७ हीने कफे मारुतस्तु पित्तं तु कुपितं द्वयम् । करोति यानि लिङ्गानि शृणु तानि समासतः ॥ ५७ ॥ भ्रममुद्वेष्टनं तोदं दाहं स्फुटनवेपने । अङ्गमर्दं परीशोषं दूयनं धूपनं तथा ॥ ५८ ॥ वात-पित्त-क्षये श्लेष्मा स्रोतांस्यपि दधद्भृशम् । चेष्टा-प्रणाशं मूर्च्छां च वाक्सङ्गं च करोति हि ॥ ५६ ॥ श्लेष्मवातक्षये पित्तं देहौजः संस्रयेच्चरत् । ग्लानिमिन्द्रियदौर्बल्यं तृष्णां मूर्च्छां क्रियाक्षयम् ॥ ६० ॥ पित्त-श्लेष्म-क्षये वायुर्मर्माण्यभिनिपीडयन् । प्रणाशयति संज्ञां च वेपयत्यथवा नरम् ॥ ६१ ॥ जिस समय कि पित्त अपनी प्रकृति में होता है और कफ क्षीण होता है, उस समय वायु पित्त को उसके स्थान से लेकर शरीर में इधर-उधर दौड़ता है । जिससे कि फटने की सी दर्द, जलन, थकान और निर्बलता उत्पन्न होती है । शरीर में कफ के प्रकृत अवस्था में होने से, पित्त के क्षीण होने पर कुपित बलवान् वायु कफ के साथ मिलकर वेदना, जड़ता, ठण्डक और भारीपन शरीर में उत्पन्न करती है । शरीर में कफ क्षीण हो, पित्त कुपित हो, वायु प्रकृति रूप में हो, तो पित्त वायु की गति बन्द करके जलन और दर्द उत्पन्न करता है । कफ समानावस्था में हो, पित्त कुपित और वायु का क्षय हो तो, कफ को रोककर पित्त शरीर में तन्द्रा अर्थात् आलस्य, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है । कफ बढ़ा हुआ हो, पित्त क्षीण हो, और वायु समानावस्थ हो, तो कफ वायु की गति को बन्द करके ठण्डक, भारीपन और ज्वर उत्पन्न कर देता है । वायु का क्षय हो, पित्त समानावस्था में हो, कफ बढ़ा हुआ हो, तो कफ पित्त की गति को बन्द करके, मन्दाग्नि, शिर का जकड़ना, नींद का आना, आलस्य, प्रलाप, हृदय रोग, शरीर का भारीपन, नख, ओष्ठ, आंख आदि को पीलापन तथा थूक में कफ और पित्त आने लगता है । वायु क्षीण हो और कफ एवं पित्त दोनों बढ़े हुए एक साथ मिलकर शरीर में अरुचि, अविपाक भोजन का अपचन, पीड़ा, भारीपन, वमन की रुचि, मुख से लार गिरना, पीड़ा, पीलापन, नशा सा, मल त्याग में विषमता, मल का कभी आना कभी नहीं आना, इसी प्रकार अग्नि की विषमता कभी भूख लगना और कभी नहीं लगना ये लक्षण उत्पन्न करते हैं । पित्त के क्षीण होने पर कफ वायु के साथ मिलकर शरीर में जड़ता, ठण्डक, कभी यहां और कभी वहां, अनिश्चित स्थान पर वेदना, भारीपन, अग्नि की निर्बलता, भोजन में अनिच्छा, कम्पन, नख ( मल, ओष्ठ,